तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026: ब्राह्मणों की अनुपस्थिति से बदलते राजनीतिक समीकरण
तमिलनाडु की राजनीति में नया मोड़
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में राजनीतिक परिदृश्य एक अनोखे मोड़ पर है। इस बार सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने ऐसी रणनीतियाँ अपनाई हैं, जो पिछले कई दशकों में शायद ही देखी गई हों। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहला अवसर है जब राज्य की किसी प्रमुख पार्टी ने ब्राह्मण समुदाय से एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK), कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) सभी की उम्मीदवार सूचियों में ब्राह्मणों की अनुपस्थिति स्पष्ट है। यह बदलाव केवल राजनीतिक संयोग नहीं है, बल्कि इसे राज्य की सामाजिक और चुनावी गणित से जोड़ा जा रहा है.
तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत है। इसलिए, पार्टियाँ अपने समीकरण उन वर्गों के इर्द-गिर्द बना रही हैं जिनका चुनावी प्रभाव अधिक है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर से तमिलनाडु की राजनीति के उस पुराने चरित्र को उजागर किया है, जहां सामाजिक प्रतिनिधित्व और वोट बैंक की गणना चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बनती है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस समय एआईएडीएमके का रुख सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी ब्राह्मण समुदाय का मजबूत समर्थन पाने वाली इस पार्टी ने इस बार एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है, जिससे राजनीतिक हलकों में कई चर्चाएँ शुरू हो गई हैं.
2021 में एआईएडीएमके ने आखिरी बार एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारा था। पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद से पार्टी की रणनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके ने केवल एक ब्राह्मण चेहरा, पूर्व पुलिस महानिदेशक आर. नटराज को मैदान में उतारा था। लेकिन इस बार पार्टी ने पूरी तरह से इस समुदाय को टिकट वितरण से बाहर रखा है। दिलचस्प बात यह है कि एआईएडीएमके की सहयोगी भाजपा ने भी अपने 27 उम्मीदवारों में किसी ब्राह्मण को जगह नहीं दी है, जबकि आम धारणा यह रही है कि तमिलनाडु में ब्राह्मण संगठनों का झुकाव भाजपा की ओर रहता है.
कुछ छोटी पार्टियों ने ब्राह्मणों को टिकट दिया है। तमिलागा वेट्री कषगम ने इस बार दो ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जबकि सीमन की पार्टी नाम तमिलर काचि ने छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। ये उम्मीदवार उन सीटों पर उतारे गए हैं, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी संख्या है, जैसे मायलापुर और श्रीरंगम। यह स्पष्ट है कि ये पार्टियाँ खास समुदायों को साधने और अपने समर्थन आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं.
एक समय था जब एआईएडीएमके को ब्राह्मण समुदाय का मजबूत समर्थन प्राप्त था, लेकिन अब यह पकड़ कमजोर होती जा रही है। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच इस समुदाय का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए एआईएडीएमके ने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव किया है। अब पार्टी को ब्राह्मण समुदाय से उम्मीदवार उतारने में पहले जैसा राजनीतिक लाभ नहीं दिख रहा है.
इस बार ब्राह्मण उम्मीदवारों की संख्या सीमित रह गई है। तमिलागा वेट्री कषगम का रुख कुछ अलग है। पार्टी पेरियार को अपना आदर्श मानती है, लेकिन उम्मीदवारों के चयन में कोई एक तय पैटर्न नहीं है। ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका देना यह संकेत देता है कि पार्टी वैचारिक और व्यावहारिक राजनीति के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है. कुल मिलाकर, इस बार राज्य की राजनीति में बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिल रहा है. ज्यादातर उम्मीदवार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों से आ रहे हैं, जबकि कभी प्रभावशाली माने जाने वाले ब्राह्मण समुदाय की मौजूदगी अब प्रमुख दलों में सीमित होती जा रही है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव केवल उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी मुद्दों और रणनीतियों में भी इसका असर दिख रहा है। अब पार्टियाँ जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर क्षेत्रीय संतुलन, स्थानीय नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक ध्यान दे रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है, जहां बड़ी आबादी वाले समुदाय चुनावी राजनीति में अधिक प्रभावशाली बने रहेंगे, जबकि छोटे समुदायों की भागीदारी सीमित हो सकती है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि उपेक्षित महसूस कर रहे समुदाय इस चुनाव में किस दिशा में अपना रुख तय करते हैं.