तमिलनाडु में महिला कॉन्स्टेबल की बहादुरी से मिली न्याय की मिसाल
महिला कॉन्स्टेबल की गवाही से मिली सजा
एक महिला कॉन्स्टेबल की गवाही ने तमिलनाडु के नौ पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब अन्य लोग पुलिस के खिलाफ बोलने से डर रहे थे, तब उन्होंने अदालत में कहा, "सर, मैं सब कुछ बताऊंगी।" यह कहानी है तत्कालीन हेड कॉन्स्टेबल एस रेवती की, जिन्होंने धमकियों और सिस्टम के दबाव के बावजूद न्याय की ओर कदम बढ़ाया। यह मामला भारत के न्यायिक प्रणाली में एक अनोखा उदाहरण है, क्योंकि एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 1999 से 2023 के बीच पुलिस कस्टडी में लगभग 2250 लोगों की मौत हुई है, लेकिन इनमें से केवल तीन मामलों में ही सजा हुई।
मामले का विवरण
यह मामला 2020 का है, लेकिन फैसला हाल ही में 7 अप्रैल 2026 को आया। यह डबल मर्डर केस एक पिता और पुत्र की मौत से संबंधित है। दोनों को पुलिस कस्टडी में इतनी यातनाएं दी गईं कि अंततः उनकी मौत हो गई। पुलिस ने उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा कि खून बहने को रोकना भी मुश्किल हो गया। इस मामले में नौ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा दी गई। यदि एस रेवती ने हिम्मत नहीं दिखाई होती, तो यह मामला इस मुकाम तक नहीं पहुंचता।
रेवती का साहस
रेवती, जो उस समय टूटूपुड़ी जिले के पुलिस स्टेशन में कार्यरत थीं, ने इस मामले में गवाह बनने का निर्णय लिया। उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने पूरी घटना का बयान दिया, जबकि उन्हें अपनी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। रेवती ने बताया कि कैसे जयराज और उनके बेटे को पुलिस ने बर्बरता से पीटा और बाद में उन्हें न्यायिक कस्टडी में भेज दिया गया। कुछ ही दिनों में दोनों की मौत हो गई।
कोर्ट का निर्णय
छह साल बाद, सीबीआई की जांच और 2000 पृष्ठों की चार्जशीट के आधार पर मदुरई के फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट के जज जी मुथू कुमारन ने सभी नौ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया। कोर्ट ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर कैटेगरी में रखा और फांसी की सजा सुनाई। इसके साथ ही, पीड़ित परिवार को ₹1 करोड़ 40 लाख का मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया।