तमिलनाडु में भाजपा की चुनावी रणनीति: एनडीए का विस्तार
भाजपा का तमिलनाडु में संघर्ष
तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहां भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्ववादी विचारधारा का लगातार विरोध होता रहा है। पिछले चुनावों में भाजपा को यहां एक भी सीट नहीं मिली। 2018 में, जब पीएम मोदी ने चेन्नई में डिफेंस एक्सपो का उद्घाटन किया, तब 'मोदी गो बैक' के नारे गूंजे थे। अब भाजपा विधानसभा चुनाव में जीत की उम्मीद के साथ एनडीए का विस्तार करना चाहती है।
भाजपा की योजना है कि वह राज्य की कई छोटी पार्टियों को एनडीए में शामिल कर सके। इस बार भाजपा हर एक वोट पर ध्यान केंद्रित कर रही है और अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटी है.
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि
यह ध्यान देने योग्य है कि तमिलनाडु वह राज्य है, जहां भाजपा अब तक विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाई है। पिछले 60 वर्षों में भाजपा की सरकार यहां नहीं बनी। हालांकि, इस बार भाजपा AIADMK के साथ गठबंधन करने की संभावना जता रही है।
वर्तमान में, एनडीए की सीट शेयरिंग पर बातचीत ठप है, क्योंकि भाजपा अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर रही है। भाजपा राज्य में अपनी सीमित उपस्थिति को बढ़ाकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। पिछले दो चुनावों में भाजपा और डीएमके के बीच वोटों का अंतर 5-6% रहा है.
जाति समूहों के साथ भाजपा की रणनीति
इस स्थिति में, एनडीए नए जाति समूहों और संगठनों को अपने साथ लाकर इस वोट अंतर को समाप्त करने की कोशिश कर रहा है। तमिलनाडु की राजनीति में थेवर, वन्नियार, दलित और ओबीसी समुदायों का महत्वपूर्ण प्रभाव है। भाजपा इन समुदायों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सामाजिक अभियानों और केंद्र सरकार की योजनाओं को बढ़ावा देने पर ध्यान दे रही है।
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को गठबंधन में 75 सीटें मिली थीं।
भाजपा की ऐतिहासिक उपस्थिति
90 के दशक में भाजपा ने पहली बार तमिलनाडु में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। 1998 और 1999 में पार्टी ने गठबंधन किया था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में तमिलनाडु के नेताओं को भी स्थान मिला। हालांकि, भाजपा कन्याकुमारी में हमेशा से मजबूत रही है। अब भाजपा केवल एक 'नॉर्थ इंडियन' पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि एक मजबूत विचारधारा के प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर रही है.