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तक्षशिला: पाकिस्तान की विवादास्पद संरक्षण नीति पर यूनेस्को की कड़ी आपत्ति

तक्षशिला, प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण धरोहर, पाकिस्तान के विवादास्पद संरक्षण कार्यों के कारण संकट में है। यूनेस्को ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान ने हस्तक्षेप नहीं रोका, तो इसे विश्व धरोहर सूची से बाहर किया जा सकता है। तक्षशिला का ऐतिहासिक महत्व और इसकी संरक्षण नीति पर सवाल उठ रहे हैं। जानें इस विवाद के पीछे की कहानी और विशेषज्ञों की राय।
 

तक्षशिला की ऐतिहासिक धरोहर पर संकट

प्राचीन भारत की समृद्ध धरोहर तक्षशिला एक बार फिर पाकिस्तान की गतिविधियों के कारण विवादों में घिर गई है। इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने की पाकिस्तान की पुरानी आदत पर अब संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक शाखा यूनेस्को ने कड़ी आपत्ति जताई है। यूनेस्को ने कहा है कि तक्षशिला के मोहरा मोरादु और सिरकप जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर किए गए संरक्षण कार्यों ने उनकी वास्तविक पहचान और ऐतिहासिक स्वरूप को नुकसान पहुंचाया है। संस्था ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान ने इस हस्तक्षेप को नहीं रोका और नुकसान की भरपाई नहीं की, तो तक्षशिला को खतरे वाली सूची में डाला जा सकता है और इसे विश्व धरोहर सूची से भी बाहर किया जा सकता है।


तक्षशिला का ऐतिहासिक महत्व

तक्षशिला, जिसे प्राचीन काल में तक्षशिला नगरी कहा जाता था, दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक मानी जाती है। यह केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों साल पुरानी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह नगरी वैदिक काल में स्थापित की गई थी और प्राचीन भारत का एक प्रमुख शिक्षा केंद्र रही है, जहां विद्यार्थी दूर-दूर से अध्ययन के लिए आते थे। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी तक्षशिला का उल्लेख मिलता है। यहां के बौद्ध विहारों, प्राचीन नगरों, स्तूपों और मठों के अवशेष उस समृद्ध इतिहास की गवाही देते हैं, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक दिशा तय की। यही कारण है कि यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया था।


विवाद की शुरुआत

यह विवाद मार्च में शुरू हुआ, जब एक आगंतुक ने पेरिस स्थित यूनेस्को में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि को कुछ तस्वीरें और सूचनाएं भेजीं। इन तस्वीरों में पंजाब पुरातत्व विभाग द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्यों को दिखाया गया था। आरोप लगाया गया कि प्राचीन दीवारों को हटाकर नई दीवारें बनाई जा रही हैं और कई स्थानों पर उनकी ऊंचाई भी बढ़ाई जा रही है, जिससे ऐतिहासिक संरचनाओं की मौलिकता प्रभावित हो रही है।


यूनेस्को का निरीक्षण

इसके बाद, यूनेस्को ने पाकिस्तान के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग तथा राष्ट्रीय धरोहर मंत्रालय के साथ मिलकर एक तकनीकी निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान पंजाब पुरातत्व विभाग अपने कार्यों को संरक्षण की प्रक्रिया बताता रहा, लेकिन वह मोहरा मोरादु और सिरकप में किए गए कार्यों से संबंधित आवश्यक दस्तावेज, प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट और पहले तथा बाद की तस्वीरें प्रस्तुत नहीं कर सका। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि कई स्थानों पर सीमेंट और आधुनिक निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया है।


संरक्षण नियमों का उल्लंघन

तस्वीरों में स्पष्ट दिखाई दिया कि जहां प्राचीन पत्थर अनियमित आकार के थे, वहीं नई दीवारों में चमकदार और समान आकार के आधुनिक पत्थर लगाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व धरोहर स्थलों पर सीमेंट का उपयोग यूनेस्को के संरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन है। इससे न केवल ऐतिहासिक प्रमाणिकता कमजोर होती है, बल्कि किसी देश की सांस्कृतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।


पाकिस्तान की संरक्षण नीति पर सवाल

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान 1997 से अपने 24 अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की कोशिश कर रहा है। लेकिन तक्षशिला में हुए कथित अवैज्ञानिक हस्तक्षेपों ने पाकिस्तान की मंशा और उसकी संरक्षण नीति दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


पंजाब पुरातत्व विभाग का बचाव

हालांकि, पंजाब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मलिक जहीर अब्बास ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि यह पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किया जा रहा संरक्षण कार्य है। उन्होंने कहा कि इन उपायों का उद्देश्य कमजोर पड़ रही संरचनाओं को संभालना और धरोहरों की प्रामाणिकता बनाए रखना है।


विशेषज्ञों की चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण के नाम पर तक्षशिला की ऐतिहासिक आत्मा से छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोहरा मोरादु के प्राचीन आंगनों को आधुनिक सामग्री से पाट दिया गया है, जिससे स्थल की मौलिक पहचान धुंधली पड़ रही है।


तक्षशिला का इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब तक्षशिला संकट में आई हो। 1998 में भी भीर टीले के पास स्टेडियम निर्माण की योजना के कारण इसे खतरे वाली सूची में डालने की चेतावनी दी गई थी। तब भारी विरोध के बाद परियोजना रोकनी पड़ी थी।


संरक्षण और विनाश के बीच

आज तक्षशिला फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां संरक्षण और विनाश के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई दे रही है। यह केवल पाकिस्तान की प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की साझा विरासत से जुड़ा प्रश्न है। तक्षशिला ने सदियों तक आक्रमण, उपेक्षा और साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा है, लेकिन अब सबसे बड़ा खतरा उन हाथों से पैदा हो गया है, जो इसे बचाने का दावा कर रहे हैं।