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टीटीवी दिनाकरन ने तमिलनाडु सरकार की सहायता योजना को चुनावी हथकंडा बताया

टीटीवी दिनाकरन ने तमिलनाडु सरकार की 2,000 रुपये की सहायता योजना को चुनावी हथकंडा करार दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर आरोप लगाया कि उन्होंने वृद्धजनों के लिए सहायता राशि बढ़ाने का वादा पूरा नहीं किया। दिनाकरन का कहना है कि इस तरह की घोषणाएं केवल चुनावी समय की हैं और सरकार जन कल्याण के स्थायी समाधानों को नजरअंदाज कर रही है। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है।
 

टीटीवी दिनाकरन की आलोचना

अम्मा मक्कल मुन्नेत्र कज़गम (AMMK) के महासचिव टीटीवी दिनाकरन ने मंगलवार को तमिलनाडु सरकार द्वारा कमजोर वर्गों, जैसे वृद्धजनों, विधवाओं, वृद्ध ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और दिव्यांगजनों को दी जा रही 2,000 रुपये की सहायता को "चुनावकालीन हथकंडा" करार दिया। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस योजना की घोषणा की, जिसमें इन समूहों की महिलाओं और लाभार्थियों के खातों में 2,000 रुपये और मासिक पेंशन जमा की गई। इसके साथ ही, उन्होंने 'कलाइग्नार मगलीर उरिमाई थिट्टम' (KMUT) योजना को भी कमजोर समूहों तक विस्तारित करने का ऐलान किया।


दिनाकरन का आरोप

दिनाकरन ने एक पोस्ट में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर आरोप लगाया कि उन्होंने वृद्धजनों को दी जाने वाली सहायता राशि को 1,500 रुपये करने का चुनावी वादा पूरा नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले केवल 2,000 रुपये की 'विशेष वित्तीय सहायता' प्रदान की।


जनता की प्रतिक्रिया

एएमएमके नेता ने कहा कि डीएमके के चुनावी हथकंडे, जिन्हें 'विशेष वित्तीय सहायता' कहा गया है, जनता के बीच लोकप्रिय नहीं होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु की जनता डीएमके को सत्ता से बेदखल करने के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटेगी। मुख्यमंत्री ने 2,000 रुपये का विशेष वित्तीय आवंटन करने की घोषणा की, जबकि डीएमके सरकार अपने 2021 के विधानसभा चुनाव घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने में विफल रही है।


स्थायी समाधान की कमी

दिनाकरन ने स्टालिन पर "स्थायी समाधानों को त्यागने" का आरोप लगाया और कहा कि उनकी योजनाएं केवल वोट बैंक को खुश करने के प्रयास हैं। उन्होंने यह भी बताया कि डीएमके सरकार ने पड़ोसी राज्यों की तरह मासिक सहायता राशि बढ़ाने की मांग कर रहे दिव्यांग व्यक्तियों पर पुलिस बल का प्रयोग किया। इस प्रकार की घोषणाएं चुनाव के समय की हैं, जो दर्शाती हैं कि सरकार जन कल्याण के स्थायी समाधानों को नजरअंदाज कर रही है।