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जेल में कला की नई कहानी: कैदियों ने बनाई अद्भुत पेंटिंग्स

गाजियाबाद की डासना जेल में कैदियों ने कला के माध्यम से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी है। एक कैदी, अरुण राणा, ने जेल में रहते हुए अद्भुत पेंटिंग्स बनाई हैं, जो कोर्ट की दीवारों पर प्रदर्शित हो रही हैं। यह कहानी न केवल सुधार की है, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे कैदी अपनी गलतियों का एहसास कर सकते हैं और समाज में एक नई शुरुआत कर सकते हैं। जानें इस प्रेरणादायक यात्रा के बारे में।
 

गाजियाबाद की डासना जेल में कला का नया अध्याय

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में आने वाले लोगों की नजरें केवल अदालत कक्षों पर नहीं, बल्कि वहां की दीवारों पर बनी पेंटिंग्स पर भी टिक जाती हैं। इन पेंटिंग्स में न्याय की देवी, जेल की सलाखों के पीछे खड़े कैदी और कानून पर विश्वास का संदेश शामिल है। इन कलाकृतियों के पीछे का कलाकार कोई प्रसिद्ध व्यक्ति नहीं, बल्कि हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा कैदी अरुण राणा है। बीसीए की पढ़ाई करने वाला अरुण अब जेल में रहते हुए अपनी कला के माध्यम से सुधार और उम्मीद की नई कहानी लिख रहा है।


डासना जेल की अनोखी पहल

गाजियाबाद की डासना जेल एक बार फिर चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां के कैदियों ने कुछ ऐसा किया है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। जेल का नाम सुनते ही कैदियों में डर पैदा होता है, लेकिन डासना जेल ने सुधार का एक नया उदाहरण पेश किया है। हाल ही में, एक कैदी ने अनिरुद्ध महाराज के दरबार में जाकर जेल प्रशासन की प्रशंसा की।


कला के माध्यम से आत्मनिर्भरता

जानकारी के अनुसार, यह कैदी हत्या के मामले में डासना जेल में बंद था। जेल में आत्मनिर्भरता के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसमें विचाराधीन कैदियों को भी शामिल किया गया है। जेल प्रशासन के प्रयासों का परिणाम यह है कि अब जो कैदी जेल से बाहर निकलते हैं, वे अपने किए गए अपराध का पश्चाताप कर रहे हैं और जेल में सीखी गई कला के माध्यम से अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।


कैदियों की रचनात्मकता

जेल से रिहा होने के बाद, कैदी समाज में आत्मनिर्भरता के कार्यों को अपनाकर एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी रहे हैं। डासना जेल में पहले भी कैदियों ने किताबें और निबंध लिखे हैं, जिससे इसे सुधार गृह का दर्जा मिला है। हाल ही में, एक कैदी ने जेल में रहते हुए पेंटिंग बनाई और उसे अनिरुद्ध आचार्य महाराज को भेंट किया।


आत्मनिर्भरता का सफर

एक कैदी ने बताया कि जेल में बिताए 10 से 11 सालों के अनुभव ने उसे अपनी गलतियों का एहसास कराया। उसने आत्मनिर्भरता के अभियान में भाग लेकर खुद को समर्थ बनाने का प्रयास किया। जेल के वार्डन शिव कुमार ने भी उसका पूरा सहयोग किया। हाल ही में, शिव कुमार को गौतम बुद्ध नगर ट्रांसफर किया गया है, जहां वे कैदियों को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं।