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जातिवाद पर विनोद सूर्यवंशी का दिल दहला देने वाला खुलासा

विनोद सूर्यवंशी, जो 'पंचायत' वेब सीरीज में नजर आए हैं, ने जातिगत भेदभाव के अपने अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे उनके गांव में दलितों को अलग रखा जाता है और उन्हें मंदिर में जाने की अनुमति नहीं होती। अपने बचपन के संघर्षों के बारे में बात करते हुए, उन्होंने एक होटल में अपने पिता के साथ हुए अपमान का भी जिक्र किया। विनोद ने यह भी बताया कि कैसे उन्होंने एक्टिंग से पहले चौकीदारी जैसे छोटे-मोटे काम किए। उनकी कहानी जातिवाद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संदेश देती है।
 

जातिगत भेदभाव की सच्चाई

Panchayat Actor: अक्सर यह कहा जाता है कि हमारे देश में जातिगत भेदभाव समाप्त हो चुका है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। जो लोग इस भेदभाव का सामना करते हैं, वही इसकी सच्चाई को बयां कर सकते हैं। चाहे आपने कितनी भी सफलता हासिल की हो, कुछ लोग आज भी जाति और धर्म के आधार पर दूसरों को आंकते हैं। लोकप्रिय वेब सीरीज ‘पंचायत के सीजन 4’ में नजर आने वाले एक्टर ने अपने बचपन में जातिगत भेदभाव का अनुभव साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे उनके गांव में दलितों को अलग रखा जाता है और उन्हें मंदिर में जाने की अनुमति नहीं होती। अपने जीवन के संघर्षों के बारे में बात करते हुए, एक्टर ने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया।


Panchayat एक्टर विनोद सूर्यवंशी को होटल में खाना खाकर खुद धोने पड़े थे बर्तन, हुआ था अपमान, अब बयां किया दर्द


विनोद सूर्यवंशी की कहानी

यह कहानी विनोद सूर्यवंशी की है, जिनका नाम आपने कई फिल्मों और वेब सीरीज में सुना होगा। उन्होंने इस वेब सीरीज में सचिव की भूमिका निभाई थी। उनकी फिल्मography में ‘थामा’, ‘सत्यमेव जयते’ और ‘जॉली एलएलबी 3’ जैसी फिल्में शामिल हैं। हाल ही में, एक्टर ने जातिवाद के मुद्दे पर एक दिल दहला देने वाला बयान दिया है, जिसमें वह खुद इसके शिकार रहे हैं।


जातिवाद का सामना

पंचायत एक्टर का बड़ा खुलासा


विनोद सूर्यवंशी ने बताया कि उनके पैतृक गांव में आज भी जातिवाद का प्रभाव है। उन्होंने अपने बचपन में देखी गई कुछ कठोर सच्चाइयों का जिक्र किया। वह कहते हैं, “कर्नाटक में मेरे गांव में जातिवाद आज भी विद्यमान है। गांव में ऊंची और नीची जातियों के लिए अलग-अलग हिस्से हैं। दलितों का हिस्सा गांव से पूरी तरह अलग है।”


पिता का अपमान और संघर्ष

जब पिता का हुआ अपमान, धोने पड़े बर्तन


एक्टर ने बताया कि जब वह अपने पिता के साथ गांव गए थे, तब उनकी उम्र केवल 12 साल थी। उन्होंने कहा, “हमने एक होटल में खाना खाया, और हमें अपनी प्लेटें खुद धोनी पड़ीं। हमें खाने के पैसे भी देने पड़े। मेरे गांव में एक ऐसा मंदिर है, जहां हमें जाने की अनुमति नहीं है।” इसके साथ ही, विनोद ने गरीबी में बड़े होने के अनुभव को भी साझा किया। वह कहते हैं, “जब त्योहार आते थे, तो हम खुश नहीं होते थे, बल्कि रोते थे, क्योंकि हम उन्हें मनाने की स्थिति में नहीं थे।”


“मैंने अपने माता-पिता को अक्सर रोते देखा। त्योहारों के समय मैं सोचता था कि ये क्यों आते हैं। दिवाली क्यों आती है? त्योहार हमें और दुखी करते थे, क्योंकि हम उन्हें दूसरों की तरह नहीं मना पाते थे। हमारी स्थिति बहुत खराब थी। अगर कोई हमें कुछ देता था, तभी हम त्योहार मना पाते थे। यही हमारी असलियत थी।”


संघर्ष और मेहनत

एक्टिंग से पहले चौकीदारी की


विनोद सूर्यवंशी ने बताया कि एक्टर बनने के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए। चौकीदारी करते समय उनके पैरों में छाले पड़ गए थे। इस अनुभव ने उन्हें यह सिखाया कि समाज किसी व्यक्ति को उसके काम से आंकता है। वह कहते हैं, “काम जितना बड़ा होगा, इज्जत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।”