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जम्मू-कश्मीर में शिक्षा प्रणाली पर विवाद: बच्चों को देश विरोधी विचारों से प्रभावित करने का आरोप

जम्मू-कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर विवादों में है, जहां सरकारी स्कूलों में विवादित किताबों के वितरण पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम ने आरोप लगाया है कि इन किताबों में अलगाववादी नेताओं को महान हस्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है, और प्रशासन की चुप्पी ने सवालों को और बढ़ा दिया है। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर किसी खतरनाक सोच का परिणाम? जानें पूरी कहानी।
 

जम्मू-कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

जम्मू-कश्मीर की सरकारी शिक्षा प्रणाली एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गई है। इस बार आरोप किसी प्रशासनिक चूक या अव्यवस्था के बजाय सीधे तौर पर देश विरोधी विचारधारा को बच्चों तक पहुंचाने के संबंध में हैं। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम ने गंभीर आरोप लगाया है कि समग्र शिक्षा योजना के तहत सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में ऐसी किताबें पहुंचाई गई हैं, जिनमें अलगाववादी नेताओं और आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को जम्मू-कश्मीर की महान हस्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस खुलासे ने राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है।


विवादित पुस्तक का विवरण

इस विवाद का केंद्र "ग्रेट पर्सनालिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जे एंड के" नामक पुस्तक है, जिसका चौथा भाग सरकारी विद्यालयों में वितरित किया गया। यह पुस्तक ओबराय बुक्स सर्विस द्वारा प्रकाशित की गई है और इसका संपादन हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने किया है। आरोप है कि इस पुस्तक को 2025-26 के शैक्षणिक सत्र में समग्र शिक्षा योजना के तहत खरीदा गया और फिर इसे सरकारी विद्यालयों की लाइब्रेरी में पहुंचा दिया गया।


पुस्तक में विवादित व्यक्तित्वों का उल्लेख

जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम के अनुसार, इस पुस्तक में मकबूल भट, सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर अहमद शाह, मसरत आलम भट, मीरवाइज उमर फारूक और मौलवी मोहम्मद फारूक जैसे विवादास्पद व्यक्तियों को "महान व्यक्तित्व" के रूप में प्रस्तुत किया गया है। संगठन का कहना है कि यह केवल इतिहास लेखन नहीं, बल्कि सुनियोजित विचारधारा का जहर फैलाने का प्रयास है, जिसका प्रभाव बच्चों और युवाओं पर पड़ सकता है।


कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

इस मामले पर मीडिया से बात करते हुए अधिवक्ता रघु मेहता ने इसे देश विरोधी मानसिकता का खतरनाक उदाहरण बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुस्तक में मकबूल भट को "शहीद मकबूल भट" और "राष्ट्रपिता" तक कहा गया है। इसके अलावा, किताब में उसके गुरिल्ला नेटवर्क की गतिविधियों को महिमामंडित किया गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जम्मू-कश्मीर को "भारतीय कब्जे वाला कश्मीर" के रूप में संदर्भित किया गया है, जो भारत की संवैधानिक स्थिति के खिलाफ है।


सरकारी तंत्र की भूमिका पर सवाल

रघु मेहता ने यह भी कहा कि किताब में मसरत आलम को बचपन से पत्थरबाज बताया गया है और भारतीय सेना को "कब्जा करने वाली सेनाएं" कहा गया है। यह सवाल उठता है कि सरकारी तंत्र में कौन लोग हैं जिन्होंने ऐसी सामग्री को मंजूरी दी। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर किसी खतरनाक सोच का परिणाम?


पीपुल्स फोरम की मांग

पीपुल्स फोरम ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जिन लोगों ने भारत विरोधी एजेंडा चलाया और पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद को बढ़ावा दिया, उन्हें बच्चों के आदर्श के रूप में पेश करना समाज और राष्ट्र के खिलाफ अपराध है। संगठन ने मांग की है कि इस पुस्तक की सभी प्रतियां तुरंत विद्यालयों से जब्त की जाएं और पूरी खरीद प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।


प्रशासन की चुप्पी

इस मामले में प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जो सवालों को और बढ़ा रही है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि बच्चों की शिक्षा के नाम पर सरकारी तंत्र में ऐसा जहर कैसे प्रवेश कर गया। यह विवाद केवल एक किताब का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच और देश की एकता से जुड़ा एक संवेदनशील मामला बन चुका है।