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चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर राजनीतिक बहस तेज, उठे सवाल

चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल की रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों का जिक्र है, जिसमें मतदाता सूची और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है। जानें इस विवाद के पीछे की वजहें और आगे की संभावनाएं।
 

चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर विवाद


चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और संस्थागत चर्चाएं बढ़ गई हैं। हाल की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि पिछले एक साल में दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी डेटाबेस से संबंधित निर्णयों पर 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं।


हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद स्पष्ट किया है कि SIR से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने कहा कि आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियां और सुझाव संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और इन्हें अंतिम निर्णयों से असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


रिपोर्ट में क्या सामने आया?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ आपत्तियों में निर्णयों की प्रक्रिया और जानकारी पर चिंता व्यक्त की गई थी।


Form-6 से जुड़ा मुद्दा

एक महत्वपूर्ण मुद्दा Form-6 से संबंधित था, जो नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि SIR से जुड़े कुछ प्रश्न इसमें जोड़े गए थे और इस बदलाव की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की गई थी।


चुनावी डेटाबेस पर सवाल

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू चुनावी डेटाबेस और उसके संचालन से संबंधित है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की मतदाता डेटाबेस तक पहुंच कैसे संचालित की जा रही है। इसमें डेटाबेस के केंद्रीकरण और अधिकारियों की भूमिका से जुड़े सवाल शामिल थे।


SIR का उद्देश्य

SIR का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची की गहन समीक्षा करना है, ताकि मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से अपात्र हो चुके नामों की पहचान की जा सके और पात्र मतदाताओं की सूची को अपडेट रखा जा सके। यह प्रक्रिया विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से लागू की जा रही है।


पश्चिम बंगाल में अपील का मामला

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद और अधिक चर्चा में रहा है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR के दौरान हटाए गए लगभग 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें कुछ नाम दोबारा जोड़ने और कुछ अन्य नाम हटाने से संबंधित हैं।


दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

दिल्ली में SIR के तहत भेजे गए नोटिसों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने कुछ नोटिसों के तरीके और उनमें इस्तेमाल किए गए "logical discrepancies" जैसे शब्दों पर सवाल किया। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या कुछ नोटिस पर्याप्त व्यक्तिगत जांच के बिना जारी किए गए।


राजनीतिक बहस का कारण

चूंकि SIR सीधे मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया है, इसलिए इसके हर चरण का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। विपक्षी दलों और कुछ संगठनों ने पारदर्शिता, नोटिस और नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक दायित्व है।


आगे की प्रक्रिया

SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ मतदाता सूची में शामिल नामों, हटाए गए नामों और आपत्तियों-अपीलों का निपटारा महत्वपूर्ण रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और चुनाव आयोग द्वारा दिए जा रहे स्पष्टीकरण भी इस प्रक्रिया की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।