गुजरात उच्च न्यायालय ने भूख के मुद्दे पर गंभीर टिप्पणी की
भुखमरी की त्रासदी पर न्यायालय की टिप्पणी
अहमदाबाद, छह अगस्त: गुजरात उच्च न्यायालय ने एक महिला की जमानत अर्जी को मंजूर करते हुए कहा कि उसकी दो वर्षीय बेटी की हत्या की घटना एक गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर करती है। न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की पीठ ने कहा कि यह घटना दर्शाती है कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, न्याय और अंतरात्मा से जुड़ी है।
अदालत ने पिछले हफ्ते दिए गए अपने निर्णय में कहा कि जब भुखमरी किसी मां को इस हद तक पहुंचा देती है, तो यह केवल उस व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस दुखद घटना को करुणा और इस संकल्प के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए कि कोई भी मां या बच्चा भूख की पीड़ा सहने के लिए मजबूर न हो।
अदालत ने लखीबेन सोलंकी की नियमित जमानत अर्जी को स्वीकार कर लिया, जो मार्च 2026 में सूरत के वराछा पुलिस थाने में दर्ज मामले में अपनी बेटी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हुई थीं। अभियोजन पक्ष का कहना है कि सोलंकी ने अपनी बेटी ईशा की बार-बार खाना मांगने पर गुस्से में आकर उसकी पिटाई की थी।
न्यायालय ने कहा, 'यह घटना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह समाज पर एक गंभीर आरोप है और यह सामाजिक न्याय और नैतिकता से जुड़े बुनियादी सवाल उठाती है।' अदालत ने यह भी कहा कि सामाजिक न्याय का सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि हर व्यक्ति को भोजन, आवास, स्वास्थ्य सेवा और सम्मान जैसी बुनियादी आवश्यकताएं मिलनी चाहिए। जब कोई मां भूख के कारण इतना कठोर कदम उठाने पर मजबूर होती है, तो यह समाज की विफलता है।
अदालत ने यह भी कहा कि यह घटना सामाजिक कल्याण प्रणाली की विफलता को दर्शाती है और कमजोर परिवारों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी को उजागर करती है। भारतीय संविधान के तहत, बच्चों को छह साल की उम्र तक प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा का मौलिक अधिकार दिया गया है, और राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा उठाए।
अपने निर्णय में, अदालत ने दो उपन्यासों का उल्लेख किया - पन्नालाल पटेल का गुजराती उपन्यास 'मानवीनी भवाई' और विक्टर ह्यूगो का 'लेस मिज़रेबल्स', जो भूख और सामाजिक व्यवस्था के विफल होने के मनोवैज्ञानिक डर को दर्शाते हैं। अदालत ने महात्मा गांधी और चार्ल्स डिकेंस के साथ-साथ हिंदू, इस्लामी और ईसाई धर्मग्रंथों का भी उल्लेख किया, जिनमें भूखों को भोजन देने को एक पवित्र कर्तव्य बताया गया है।
पीठ ने कहा कि यह घटना दिल दहला देने वाली है और यह याद दिलाती है कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, न्याय और अंतरात्मा का मामला है। महात्मा गांधी के उद्धरण का उल्लेख करते हुए कहा गया कि 'दुनिया में ऐसे लोग हैं जो इतने भूखे हैं कि उन्हें भगवान रोटी के रूप में ही दिखाई दे सकते हैं।' फैसले में कहा गया है, 'सभी धर्म यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति को भूख से मरने देना न केवल एक सामाजिक विफलता है, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक विफलता भी है।'