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खाड़ी संकट का असर: कैंसर की दवाएं बाजार से गायब

खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संकट का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि कैंसर की दवाओं पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है। सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी महत्वपूर्ण दवाएं बाजार से गायब हो गई हैं, जिससे मरीजों को दवा की तलाश में भटकना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और सरकारी मूल्य नियंत्रण इस समस्या के मुख्य कारण हैं। जानें इस संकट के पीछे की वजहें और इसके संभावित परिणाम।
 

खाड़ी क्षेत्र में संकट का प्रभाव

खाड़ी क्षेत्र में चल रहे तनाव और होर्मुज़ संकट का प्रभाव केवल ईंधन और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि दवाओं और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर भी गंभीर असर डाल रहा है। कैंसर से संबंधित दो महत्वपूर्ण दवाएं, सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन, हाल के दिनों में बाजार से गायब हो गई हैं। पिछले दो हफ्तों में, ये दवाएं देशभर के मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध नहीं हैं। कीमोथेरेपी के लिए ये दवाएं आमतौर पर सस्ती होती हैं।


विशेषज्ञों की चिंता

कैंसर विशेषज्ञों ने इन दवाओं की कमी को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उद्योग के जानकारों का मानना है कि कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि इस समस्या का मुख्य कारण है। होर्मुज़ संकट ने इस स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। कंपनियों के लिए कीमतें बढ़ाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि वे सरकारी मूल्य नियंत्रण के अधीन हैं।


दवाओं की मांग और कमी

सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रमुख डॉक्टर श्याम अग्रवाल ने बताया कि उनके अस्पताल की फार्मेसी में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की उपलब्धता खत्म हो गई है। हर 10 में से लगभग 7 मरीजों को इनमें से किसी एक दवा की आवश्यकता होती है। ये दवाएं मुंह, फेफड़े, गर्भाशय ग्रीवा, अंडाशय, ग्रासनली और स्तन कैंसर के इलाज में महत्वपूर्ण हैं।


दवाओं की उपलब्धता की स्थिति

नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर अभिषेक शंकर ने कहा कि पिछले दो हफ्तों से इन दवाओं की कमी बनी हुई है। कम डोज वाली दवाएं पूरी तरह से गायब हो गई हैं, जबकि उच्च डोज वाली दवाएं कुछ स्थानों पर उपलब्ध हैं।


प्लैटिनम की कीमतों में वृद्धि

मुंबई में भी स्थिति गंभीर है। लीलावती अस्पताल के डॉक्टर मोहन मेनन ने बताया कि प्लैटिनम से बनी सभी कीमोथेरेपी दवाओं की कमी हो गई है। उन्होंने कहा कि 2023 के मध्य में प्लैटिनम की कीमत 2,700 रुपये प्रति ग्राम थी, जो अब 7,800 रुपये प्रति ग्राम से अधिक हो गई है।


दवाओं की कमी के कारण

हालांकि, युद्ध के बाद कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण कई मेडिकल उत्पादों की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन इन दवाओं के निर्माताओं ने कीमतें नहीं बढ़ाई हैं। ये दवाएं 'ड्रग प्राइसिंग कंट्रोल ऑर्डर' के तहत आती हैं, जो देश में सभी आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है।


प्लैटिनम की बढ़ती मांग

प्लैटिनम की कीमतों में वृद्धि का एक कारण दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन में कमी है। इसके अलावा, ऑटोमोटिव क्षेत्र और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में इसकी बढ़ती मांग भी एक कारण है। पश्चिम एशिया में तनावपूर्ण हालात ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया है।