क्या भारत में प्लास्टिक के नोटों का चलन होगा? जानें इसके फायदे और दुनिया के उदाहरण
प्लास्टिक नोटों की ओर बढ़ता भारत
आपकी जेब में मौजूद कागजी नोट जल्द ही अतीत की बात बन सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) नकदी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाने की योजना बना रहा है। केंद्रीय बैंक अब पारंपरिक कागज के नोटों के स्थान पर प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोट छापने पर विचार कर रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पटना और मुंबई में हाल ही में हुई आरबीआई की बोर्ड बैठकों में इस विषय पर गहन चर्चा की गई। लेकिन क्या यह विचार नया है? बिल्कुल नहीं। कई देशों ने पहले ही इस तकनीक को अपनाया है। आइए जानते हैं कि प्लास्टिक के नोटों में क्या विशेषता है और ये किन देशों में प्रचलित हैं।
पॉलीमर करेंसी की दीर्घकालिकता
कागजी नोटों को हटाने का मुख्य कारण उनकी लागत और टिकाऊपन है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक के नोट कागज के नोटों की तुलना में लगभग ढाई गुना अधिक समय तक चलते हैं। ये पानी, नमी और गंदगी से प्रभावित नहीं होते और जल्दी फटते नहीं हैं, जिससे बार-बार छापने की लागत में कमी आती है। इसके अलावा, प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी नकल करना या जाली नोट बनाना लगभग असंभव होता है। इन फायदों के कारण, दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस विकल्प की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
प्लास्टिक नोटों को अपनाने वाले देश
दुनिया भर में लगभग 60 देश प्लास्टिक के नोटों का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन कुछ बड़े देश हैं जिन्होंने कागजी नोटों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।
- ऑस्ट्रेलिया: यह दुनिया का पहला देश है जिसने 1988 में प्लास्टिक नोटों की शुरुआत की। यह देश इन नोटों का उत्पादन भी करता है।
- न्यूजीलैंड: 1999 में, न्यूजीलैंड ने अपने सभी कागजी नोटों को समाप्त कर दिया। यहां का सबसे छोटा नोट 5 डॉलर और सबसे बड़ा 100 डॉलर है।
- ब्रूनेई: इस देश ने जाली नोटों के खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह से प्लास्टिक नोटों को अपनाया है।
- वियतनाम: 2003 में यहां पॉलीमर नोटों की शुरुआत हुई। आज वियतनामी डोंग पूरी तरह से प्लास्टिक का है।
- रोमानिया: यह यूरोप का एकमात्र देश है जिसने 2005 में अपने सभी नोटों को पॉलीमर में बदल दिया।
- पापुआ न्यू गिनी: यहां 1975 तक ऑस्ट्रेलियन डॉलर चलता था, लेकिन अब केवल प्लास्टिक नोट प्रचलित हैं।
वैश्विक स्तर पर पॉलीमर नोटों का बढ़ता चलन
वैश्विक स्तर पर पॉलीमर नोटों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। 1988 में ऑस्ट्रेलिया के 10 डॉलर के नोट से शुरू हुआ यह सफर अब सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड तक पहुंच चुका है। यूरोप में, रोमानिया ने 1998 में इसकी शुरुआत की, जबकि कनाडा ने 2011 में इसे अपनाया। हालांकि, अमेरिकी डॉलर पूरी तरह से प्लास्टिक का नहीं होता, बल्कि इसे कॉटन और लिनन के मिश्रण से बनाया जाता है।