कोलकाता का ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर: आस्था और इतिहास का संगम
ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर का महत्व
कोलकाता, जो अपने अद्भुत खानपान और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है, मां काली के मंदिरों के लिए भी जाना जाता है। इनमें से एक प्रमुख स्थल ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर है। इस मंदिर की चर्चा उस समय बढ़ गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल चुनाव के दौरान यहां आकर माता काली के समक्ष मत्था टेका। यह मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला के लिए, बल्कि अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना से भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
ठंठनिया कालीबाड़ी की धार्मिक मान्यताएं
इस मंदिर में मां काली के 'सिद्धेश्वरी' रूप की पूजा की जाती है, जिसे भक्तों द्वारा अत्यंत सौम्य और जागृत माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद मां सिद्धेश्वरी पूरी करती हैं। यहां हर दिन भक्तों की भीड़ लगी रहती है, विशेषकर मंगलवार, शनिवार और अमावस्या के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। ठंठनिया कालीबाड़ी तंत्र पूजा के लिए भी प्रसिद्ध है। अन्य काली मंदिरों की तुलना में, यहां की मिट्टी की मूर्ति स्थायी है, जो इसकी एक अनूठी विशेषता है।
ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर का इतिहास
इस मंदिर की स्थापना 1703 में तांत्रिक उदय नारायण ब्रह्मचारी द्वारा एक श्मशान पर की गई थी। बाद में, 1806 में व्यापारी शंकर घोष ने इसे पुनः स्थापित किया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में जब कोलकाता के चारों ओर घने जंगल थे, तब डाकुओं से लोगों को सचेत करने के लिए यहां एक लोहे के घंटे को जोर से बजाया जाता था। उस घंटे की 'ठनठन' आवाज के कारण इस क्षेत्र और मंदिर का नाम 'ठंठनिया' पड़ा। यहां मां काली की मूर्ति मिट्टी से बनी है, जिसे हर साल लाल और काले रंगों से सजाया जाता है।