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केरल हाई कोर्ट ने 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की प्रेग्नेंसी समाप्त करने की अनुमति दी

केरल उच्च न्यायालय ने एक 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की 28 हफ्ते की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी है। न्यायालय ने लड़की की मानसिक स्थिति को प्राथमिकता देते हुए केरल सरकार को निर्देश दिया कि आवश्यक कदम उठाए जाएं। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में गर्भावस्था के दौरान संभावित स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख किया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि बच्चा जीवित नहीं रहता है, तो भ्रूण के ऊतकों को सुरक्षित रखना आवश्यक है। इस निर्णय ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है।
 

कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

केरल उच्च न्यायालय ने एक 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की 28 हफ्ते की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी है। न्यायालय ने इस निर्णय में लड़की की मानसिक स्थिति को प्राथमिकता दी। कोर्ट ने केरल सरकार को निर्देश दिया कि जब लड़की और उसके पिता इस प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति का लिखित हलफनामा प्रस्तुत करें, तो तुरंत आवश्यक कदम उठाए जाएं। जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि यह याचिका मंजूर करना आवश्यक था क्योंकि लड़की गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती थी।


कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि गर्भपात के बाद बच्चा जीवित रहता है, तो राज्य को नवजात शिशु की उचित देखभाल सुनिश्चित करनी होगी। यदि लड़की बच्चे को नहीं रखना चाहती, तो उसे 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' के तहत किसी चाइल्ड केयर संस्थान या विशेष गोद लेने वाली एजेंसी को सौंपा जाएगा।


मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट

यह आदेश पीड़िता के पिता द्वारा दायर याचिका पर आधारित है। मेडिकल बोर्ड ने बताया कि गर्भावस्था के 28 हफ्ते में बच्चे का जन्म के समय वजन लगभग 1 किलोग्राम होगा और जीवित रहने की संभावना 80 प्रतिशत है। हालांकि, समय से पहले जन्म के कारण बच्चे को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जैसे रेटिनोपैथी, नेक्रोटाइज़िंग कोलाइटिस, इंट्रावेंट्रिकुलर हैमरेज और सांस लेने में कठिनाई।


बोर्ड ने यह भी कहा कि यदि गर्भावस्था 34 हफ्ते के आस-पास हो, तो इन समस्याओं का खतरा कम होता है। इसके अलावा, करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह के कारण जटिलताओं की संभावना भी बनी रहती है। न्यायाधीश ने कहा कि यद्यपि बोर्ड ने यह सलाह दी थी कि गर्भावस्था के 34 हफ्ते के करीब भ्रूण में जटिलताओं का खतरा कम होता है, लेकिन बलात्कार पीड़िता की स्थिति में गर्भावस्था से होने वाली मानसिक पीड़ा को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।


सरकार की जिम्मेदारियाँ

अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित नहीं रहता है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भ्रूण के ऊतकों और रक्त के नमूने आवश्यक चिकित्सा परीक्षणों के लिए सुरक्षित रखे जाएं, जिसमें डीएनए फिंगरप्रिंटिंग और मैपिंग शामिल हैं, क्योंकि यौन उत्पीड़न के मामले में एफआईआर पहले ही दर्ज की जा चुकी है। अदालत ने गर्भपात की अनुमति दी और राज्य द्वारा उठाए जाने वाले कदमों को स्पष्ट किया, साथ ही प्रक्रिया के बाद संभावित परिणामों के लिए निर्देश भी जारी किए।