केरल विधानसभा चुनाव 2026: त्रिकोणीय मुकाबले की तैयारी
केरल में चुनावी हलचल
केरल में 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ तेज हो गई हैं। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त होगा, जिससे मार्च-अप्रैल 2026 में मतदान की संभावना बढ़ गई है। दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने राज्य की पारंपरिक राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है, जिससे 2026 का चुनाव अब 'त्रिकोणीय' मुकाबला बनता दिख रहा है। केरल की राजनीति भारत के अन्य राज्यों से भिन्न और दिलचस्प है। यहाँ की राजनीतिक गतिविधियाँ दशकों से दो प्रमुख गठबंधनों के बीच चलती रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में बीजेपी के उभरने से समीकरण बदल रहे हैं।
मुख्य गठबंधन: दो ध्रुवों की राजनीति
केरल में पारंपरिक रूप से दो प्रमुख गठबंधन सत्ता में आते रहे हैं:-
LDF (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट): इस गठबंधन का नेतृत्व CPIM (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी) करती है, और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन इसके प्रमुख चेहरा हैं। यह गठबंधन वामपंथी विचारधारा और कल्याणकारी योजनाओं पर जोर देता है।
UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट): इसका नेतृत्व कांग्रेस करती है, जिसमें मुस्लिम लीग (IUML) और केरल कांग्रेस जैसे दल शामिल हैं। यह गठबंधन मध्यमार्गी और सभी समुदायों को साथ लेकर चलने वाली 'बिग टेंट' नीति अपनाता है।
2026 चुनाव से पहले का नया समीकरण
दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने 2026 की राजनीतिक तस्वीर को बदल दिया है:-
कांग्रेस (UDF) की वापसी: यूडीएफ ने निकाय चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि जनता वर्तमान वामपंथी सरकार में बदलाव चाहती है।
बीजेपी (NDA) का उदय: बीजेपी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम में ऐतिहासिक जीत हासिल की और अपना मेयर बनाया। अमित शाह ने जनवरी 2026 में केरल का दौरा कर 'मिशन 2026' का ऐलान किया है, जिसमें वे 30-40% वोट शेयर का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
चुनाव की संभावित समयरेखा
मतदान: अप्रैल 2026 (संभावित)
कुल सीटें: 140
बहुमत का आंकड़ा: 71
प्रमुख गठबंधन और दल
केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है:-
LDF (Left Democratic Front): इसका नेतृत्व CPIM कर रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेंगे।
UDF (United Democratic Front): इसका नेतृत्व कांग्रेस (INC) कर रही है। हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार प्रदर्शन (500 से अधिक पंचायतों और 5 नगर निगमों में जीत) के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है।
NDA (National Democratic Alliance): इसका नेतृत्व बीजेपी (BJP) कर रही है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत और मेयर पद हासिल करने के बाद बीजेपी खुद को एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में पेश कर रही है।
हालिया राजनीतिक हलचल
अमित शाह का दौरा: 11 जनवरी 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तिरुवनंतपुरम में एक जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने 'विकसित केरल' का नारा दिया और LDF-UDF के 'बारी-बारी से सत्ता' के चक्र को खत्म करने की अपील की।
कांग्रेस की रणनीति: विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने स्थानीय निकाय चुनावों की जीत को 2026 के लिए 'सेमीफाइनल की जीत' बताया है और दावा किया है कि इस बार UDF की वापसी तय है।
बीजेपी का लक्ष्य: बीजेपी इस बार केरल में कम से कम 25% वोट शेयर और 35 प्रमुख सीटों पर जीत दर्ज करने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
राजीव चंद्रशेखर की सक्रियता: केरल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राजीव चंद्रशेखर ने एलडीएफ सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री को सार्वजनिक बहस की चुनौती दी है।
त्रिकोणीय मुकाबला: तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बीजेपी का बढ़ता वोट शेयर (35% तक) कांग्रेस और वामपंथी दलों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
चुनाव के प्रमुख मुद्दे
एंटी-इनकंबेंसी: एलडीएफ सरकार के 10 साल के शासन के बाद, विपक्षी दल भ्रष्टाचार (को-ऑपरेटिव और एआई कैमरा घोटाला) को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं।
सबरीमाला विवाद: धार्मिक आस्था और मंदिर की संपत्तियों के संरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चुनाव के केंद्र में है।
अर्थव्यवस्था: राज्य के बढ़ते कर्ज और वित्तीय संकट को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों सरकार को घेर रहे हैं।
युवा और रोजगार: युवाओं का विदेशों में पलायन और रोजगार के अवसरों की कमी एक गंभीर चुनावी मुद्दा है।
केरल की राजनीति की अनूठी विशेषताएं
उच्च साक्षरता और जागरूकता: यहाँ के मतदाता बहुत जागरूक हैं, इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा यहाँ के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे होते हैं।
बारी-बारी से सत्ता: दशकों से यहाँ हर 5 साल में सरकार बदलती थी। हालाँकि, 2021 में पिनाराई विजयन ने लगातार दूसरी बार जीतकर इस इतिहास को बदल दिया। अब 2026 में सवाल है कि क्या वे 'हैट्रिक' लगा पाएंगे।
धार्मिक संतुलन: केरल में हिंदू (लगभग 54%), मुस्लिम (26%) और ईसाई (18%) आबादी का संतुलन है। इसलिए, कोई भी दल किसी एक समुदाय को नजरअंदाज करके सत्ता में नहीं आ सकता।
निष्कर्ष: 2026 का चुनाव ऐतिहासिक हो सकता है। जहाँ कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं बीजेपी पहली बार केरल में 'सत्ता की दावेदार' के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। वामपंथी दलों के लिए यह अपनी 'किलेबंदी' बचाने की आखिरी जंग जैसी होगी।