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किस्मत का खेल: एक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष की दुखद कहानी

जूली आदिवासी की कहानी एक ऐसी महिला की है, जो कभी जिला पंचायत अध्यक्ष थीं और अब अकेली और बेसहारा हैं। उनके जीवन में आए बदलाव ने उन्हें मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया है। जानें कैसे किस्मत ने उनका जीवन बदल दिया और क्या सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए।
 

किस्मत का अजीब खेल


किस्मत कब किसकी दिशा बदल दे, यह कोई नहीं जानता। कभी एक व्यक्ति ऊंचाइयों को छूता है, तो कभी वही व्यक्ति कठिनाइयों में फंस जाता है। मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की जूली आदिवासी की कहानी कुछ ऐसी ही है। एक समय में वह जिला पंचायत अध्यक्ष थीं, लेकिन आज वह अकेली और बेसहारा हैं।


जूली का जीवन एक समय लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमने का था, लेकिन अब उनके बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हैं। यह जानकर आश्चर्य होता है कि इतनी ऊंचाइयों को छूने के बाद उनका जीवन इस मोड़ पर कैसे आ गया।


एक समय की प्रभावशाली नेता


किस्मत का खेल वाकई अजीब है। जूली आदिवासी, जो कभी बड़े अधिकारियों द्वारा 'मैडम' कहकर संबोधित की जाती थीं, अब बकरी चराकर और मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट भर रही हैं। उनके बच्चे पहले अच्छे स्कूलों में पढ़ते थे, लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है।


जब जूली ने प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदन किया, तो उन्हें बताया गया कि उनके पास सरकारी आवास है, इसलिए वह इस योजना का लाभ नहीं ले सकतीं। जूली का कहना है कि पहले उनके पास सरकारी आवास था और एक कार का काफिला होता था, लेकिन अब वह एक छोटे से घर में अपने बच्चों और एक बकरी के साथ रह रही हैं।


जूली की स्थिति पर विचार करते हुए, क्या सरकार को उनकी मदद नहीं करनी चाहिए? उन्हें एक स्थायी आवास और पेंशन मिलनी चाहिए ताकि उनके बच्चे स्कूल जा सकें और उनका जीवन बेहतर हो सके।