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काशी में गंगा की तलहटी से मिला प्राचीन शिवलिंग

वाराणसी में गंगा की तलहटी से मिले 2 क्विंटल वजनी शिवलिंग ने पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों के बीच हलचल मचा दी है। यह अद्भुत शिवलिंग मछली पकड़ने के जाल में फंसा हुआ पाया गया और इसके आकार और नक्काशी से यह 9वीं या 10वीं शताब्दी का प्रतीत होता है। स्थानीय लोगों ने इसे पूजा-अर्चना के लिए सुरक्षित रखा है। जानें इस शिवलिंग के पीछे का रहस्य और इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में।
 

गंगा में मिला अद्भुत शिवलिंग


वाराणसी: महादेव की पवित्र नगरी काशी में शिवलिंग का मिलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन गंगा की गहराइयों से 2 क्विंटल वजनी शिवलिंग का मिलना इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। यह शिवलिंग रामनगर थाना क्षेत्र के सूजाबाद इलाके में मछली पकड़ने के लिए लगाए गए जाल में फंसा हुआ पाया गया।


दो दिन पहले, काले चमकदार पत्थर से बना यह शिवलिंग चर्चा का केंद्र बन गया है। इसे सूजाबाद के निकट गंगा किनारे एक चबूतरे पर रखकर पूजा-अर्चना की जा रही है।


मछली पकड़ने के लिए डाले गए जाल में एक भारी वस्तु फंसी हुई थी, जिससे जाल बाहर नहीं निकल पा रहा था। कुछ मल्लाहों ने जाल को निकालने के लिए गंगा की तलहटी में जाकर देखा, जहां उन्हें शिवलिंग के आकार का एक बड़ा पत्थर दिखाई दिया। लगभग डेढ़ दर्जन मल्लाहों ने मिलकर इसे बाहर निकाला। जैसे ही यह पत्थर पानी से बाहर आया, सभी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं।


यह पत्थर बेहद चमकदार और काले रंग का था, जिसका आकार शिवलिंग जैसा था। इसके नीचे अरघा भी बना हुआ था और एक तरफ सांप की आकृति उकेरी गई थी। शिवलिंग निकलते ही लोगों ने हर-हर महादेव के नारे लगाते हुए इसे सुरक्षित रखा। स्थानीय लोगों ने इसे घाट के पास चबूतरे पर रखकर विधिवत पूजा शुरू कर दी।


बीएचयू के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह ने बताया कि यह शिवलिंग 9वीं या 10वीं शताब्दी का हो सकता है। इस प्रकार की नक्काशी आमतौर पर इसी काल की मूर्तियों पर पाई जाती है। हालांकि, इसकी सही उम्र का अनुमान लगाना अभी कठिन है। प्रोफेसर ने कहा कि काशी में इस तरह के शिवलिंग का मिलना सामान्य है, लेकिन यह जानना मुश्किल है कि यह नदी की तलहटी में कैसे पहुंचा।