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कांग्रेस सांसद ने DMK की नीति पर उठाए सवाल, राम मंदिर ट्रस्ट की जांच की मांग

कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने DMK की बदलती नीति पर सवाल उठाते हुए राम मंदिर ट्रस्ट की सार्वजनिक जांच की मांग की है। उन्होंने परिसीमन विधेयक के संभावित प्रभावों पर भी चिंता जताई, जिसमें उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच सीटों के असमान वितरण का मुद्दा उठाया। चिदंबरम का कहना है कि सदस्यों की संख्या बढ़ने से संसदीय बहसों की प्रभावशीलता कम हो जाएगी। जानें इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में अधिक जानकारी।
 

DMK की नीति पर कांग्रेस सांसद की आलोचना

कांग्रेस के सांसद कार्ति चिदंबरम ने सोमवार को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की नीति में बदलाव पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि DMK को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट की सार्वजनिक जांच की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा ऑडिट और संसदीय चर्चा शामिल होनी चाहिए।


चिदंबरम ने DMK के बदलते रुख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह पूछना चाहिए कि वे अपना स्टैंड क्यों बदल रहे हैं। उनके अनुसार, DMK को 'एक देश, एक चुनाव' के प्रस्ताव का लालच दिया जा रहा है। यदि DMK इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो आगामी चुनावों में उनकी स्थिति हाल के विधानसभा चुनावों से भी खराब हो सकती है।


परिसीमन विधेयक पर चिदंबरम की चिंताएँ

कांग्रेस सांसद ने प्रस्तावित परिसीमन विधेयक पर अपनी चिंताओं को व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि DMK अपने पुराने विरोध को जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि पिछली बार DMK ने विधेयक का विरोध किया था, और उन्हें उम्मीद है कि इस बार भी ऐसा ही होगा।


चिदंबरम ने बताया कि भले ही सीटों में वृद्धि प्रतिशत के हिसाब से समान लगे, लेकिन वास्तविक संख्या में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच का अंतर बढ़ जाएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु और पुडुचेरी के पास वर्तमान में 40 सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश के पास 80 हैं। यदि सीटों को 50% बढ़ाया जाता है, तो तमिलनाडु और पुडुचेरी की सीटें 60 हो जाएंगी, जबकि उत्तर प्रदेश की 120। इस प्रकार, वास्तविक संख्या में अंतर बढ़ जाएगा।


संसदीय बहसों पर प्रभाव

चिदंबरम ने यह भी कहा कि लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने से संसदीय बहसों की प्रभावशीलता कम हो जाएगी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 543 सदस्यों के होते हुए भी बोलने का समय बहुत कम मिलता है, और 815 सदस्यों की स्थिति में यह और भी कम हो जाएगा।


उन्होंने चेतावनी दी कि सदन एक 'स्टैम्पिंग हाउस' में बदल सकता है, जहां सदस्यों की पहचान भी मुश्किल हो जाएगी। इस प्रकार, एक बड़ी संसद प्रभावहीन हो सकती है।


राजनीतिक घटनाक्रमों पर नज़र

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