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कर्म और निष्कर्मता: जीवन में संतुलन कैसे बनाए रखें

इस लेख में कर्म और निष्कर्मता के बीच संतुलन बनाने के तरीकों पर चर्चा की गई है। यह समझाया गया है कि कर्म का त्याग करना संभव नहीं है, लेकिन इसे सही दृष्टिकोण से किया जा सकता है। उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे कर्म करते हुए भी हम आंतरिक शांति और संतुलन बनाए रख सकते हैं। जानें कि कैसे कर्मयोग के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।
 

कर्म का अर्थ और निष्कर्मता


कई बार यह सवाल उठता है कि यदि कर्म का त्याग करना है, तो उन्हें करना क्यों चाहिए? इसे इस तरह समझा जा सकता है कि कर्म का त्याग करना उनके स्वरूप से नहीं, बल्कि एक आंतरिक स्थिति का निर्माण करना है। इसका मतलब है कि कर्म करते समय हमें उनके परिणामों से न तो दुखी होना चाहिए और न ही अत्यधिक प्रसन्नता में आना चाहिए। इस स्थिति में, हमारे भीतर संतुलन बना रहता है, जिससे कर्म हमें प्रभावित नहीं कर पाते।


उदाहरण से समझना

एक उदाहरण लें: खाना पकाने के लिए आग जलाना और पकने के बाद उसे बुझाना। यदि कोई पूछे कि जब आग बुझानी थी, तो जलाई क्यों? यह सवाल बचकाना है। आग जलाने से खाना पकता है, और जब काम खत्म हो जाता है, तो आग बुझा दी जाती है। इसी तरह, कर्मयोग के माध्यम से निष्कर्मता की प्राप्ति होती है।


कर्म का अपरिहार्य होना

जब तक जीवन है, कर्म करना आवश्यक है। भगवान ने कहा है कि कोई भी एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सभी को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। गीता में कहा गया है कि कर्म केवल स्थूल शरीर से नहीं, बल्कि सूक्ष्म और कारण शरीर से भी होते हैं।


मानसिक कर्म और संस्कार

मानसिक कर्म भी स्थूल कर्मों की तरह चित्त पर प्रभाव डालते हैं। यदि हम स्थूल कर्मों को छोड़ दें, तो भी विचार और चिंतन में कर्म चलते रहते हैं। ये भी हमें उद्वेलित करते हैं।


प्रकृति और आत्मा का संबंध

मनुष्य का शरीर, मन और बुद्धि प्रकृति का हिस्सा हैं, जो कभी स्थिर नहीं रहती। इसलिए, ये हमेशा क्रियाशील रहते हैं। जब हम इनसे अपने को अलग मानते हैं, तो हम उनके पाप के लिए उत्तरदायी नहीं होते। जैसे श्वास लेना और हृदय का धड़कना स्वाभाविक क्रियाएँ हैं।


कर्म का सही दृष्टिकोण

प्रकृति के गुणों के कारण जो क्रियाएँ होती हैं, उन्हें साक्षी भाव से देखें। जब हम अपने को कर्ता मान लेते हैं, तब हम कर्मों के फल के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं। इसलिए, सुख या दुःख का अनुभव करते हैं।


कर्मयोग का महत्व

कर्म का त्याग संभव नहीं है, क्योंकि यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है। इसलिए, हमें कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहने का तरीका खोजना चाहिए। यही कर्मयोग है।


आत्मा की स्थिति

आत्मा अक्रिय और अविनाशी है। जब तक जीव अपने शरीर से जुड़ा रहेगा, तब तक कर्म करना अपरिहार्य है। कर्म करने और न करने की शक्तियाँ मनुष्य में होती हैं, लेकिन उसे समझना चाहिए कि कर्म क्या है।


कर्म का सही तरीका

हमें कर्म करना है, लेकिन तरीका बदलना होगा। हमें परिवार का पालन-पोषण करना है और समाज की भलाई के लिए काम करना है, लेकिन यह सब कर्ता के अभिमान और फल की आसक्ति को छोड़कर करना चाहिए।