कपूरथला की रियासत का अनोखा किस्सा: भविष्यवाणी और जेल की कहानी
भविष्यवाणी का रहस्य
सौ साल पहले एक लाख रुपये की राशि एक बड़ी रकम मानी जाती थी। यह राशि एक राज ज्योतिषी को मिली थी, जो एक भविष्यवाणी के आधार पर थी। 1926 में कपूरथला की रियासत में इस भविष्यवाणी को लेकर काफी हलचल मची थी। जैसे ही खुशखबरी मिली, पूरे रियासत में जश्न की तैयारियां शुरू हो गईं। उत्सुक महाराजा पूरी रात जागते रहे, लेकिन 17 जुलाई 1926 की सुबह लेडी डॉक्टर मिस पेरिरा द्वारा दी गई खबर ने उन्हें निराश कर दिया।
उत्तराधिकार की चिंता
कपूरथला के महाराजा जगजीत सिंह अपने उत्तराधिकार को लेकर चिंतित थे। उनके बड़े बेटे युवराज परमजीत सिंह का विवाह जब्बल रियासत की राजकुमारी वृंदा से हुआ था, लेकिन उनके तीनों बच्चे बेटियां थीं। उस समय के कानून के अनुसार बेटियों के पिता को राजगद्दी नहीं मिल सकती थी। इसलिए युवराज ने पुत्र प्राप्ति के लिए कई उपाय किए।
भविष्यवाणी का जश्न
राज ज्योतिषी पंडित श्रीराम ने भविष्यवाणी की कि युवरानी वृंदा इस बार पुत्र को जन्म देंगी। इस पर महाराजा ने विशेष पूजा-अर्चना के लिए एक लाख रुपये दिए। पंडित जी ने इस राशि का एक हिस्सा जमीन में गाड़ दिया। दरबार ने इस भविष्यवाणी को गंभीरता से लिया और भारत सरकार के प्राइम मिनिस्टर ने जश्न के लिए दो लाख रुपये का बजट मंजूर किया।
जश्न की तैयारी
पुत्र जन्म की सूचना मिलते ही फौज के प्रधान सेनापति को एक सौ एक तोपों की सलामी देने का आदेश दिया गया। महल को रंग-बिरंगे लट्टू और फूलों से सजाने की तैयारी चल रही थी। रियासत की प्रजा भी जश्न मनाने के लिए उत्सुक थी। लेकिन जब युवरानी ने फिर से पुत्री को जन्म दिया, तो महाराजा का गुस्सा राज ज्योतिषी पर फूट पड़ा।
जेल की सजा
राज ज्योतिषी पंडित श्रीराम को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया। महल में मातम छा गया और रियाया निराश होकर लौट गई। महारानी ने चिंता जताई कि ज्योतिषी को जेल में डालने से प्रकोप बढ़ सकता है। उन्होंने दीवान जरमनी दास से महाराजा को मनाने के लिए कहा।
मैडम सेरी का जादू
मैडम सेरी, जो महाराजा की करीबी थीं, ने महाराजा को मनाने का प्रयास किया। उन्होंने महाराजा को स्नान के दौरान दयालु होने की प्रार्थना की। अंततः महाराजा ने ज्योतिषी को रिहा करने का आदेश दिया, लेकिन उनकी संपत्ति जब्त करने की शर्त रखी।
सपने का सच होना
कुछ दिनों बाद, महाराजा को एक सपना आया जिसमें गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा कि यदि उनका पुत्र सिख धर्म का पालन करेगा, तो उन्हें पौत्र प्राप्त होगा। महाराजा ने तुरंत कैबिनेट की बैठक बुलाई और गुरुद्वारे जाकर शपथ लेने का निर्णय लिया।