एनआईए ने हुर्रियत नेताओं के खिलाफ दाखिल किया आरोप पत्र, 1996 की हिंसा का मामला
एनआईए ने 1996 में श्रीनगर में हुई हिंसा से जुड़े हुर्रियत कांफ्रेंस के छह नेताओं के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया है। यह मामला एक मारे गए आतंकवादी के जनाजे के दौरान हुई हिंसा से संबंधित है। आरोप पत्र में शामिल नेताओं में शब्बीर अहमद शाह, सैयद अली शाह गिलानी और अन्य का नाम है। एनआईए का कहना है कि यह एक पूर्व नियोजित साजिश थी, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाना था। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और इसके पीछे की सच्चाई।
Jul 11, 2026, 16:46 IST
हुर्रियत नेताओं पर आरोप पत्र दाखिल
करीब तीन दशकों पुराने एक प्रमुख मामले में, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के छह प्रमुख नेताओं के खिलाफ आरोप पत्र प्रस्तुत किया है। यह मामला 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर में एक मारे गए आतंकवादी के जनाजे के दौरान हुई हिंसा, पुलिस पर हमले, सरकारी संपत्ति को नुकसान और भारत विरोधी गतिविधियों से संबंधित है। एनआईए का कहना है कि यह कोई आकस्मिक भीड़ नहीं थी, बल्कि यह एक पूर्व नियोजित साजिश थी, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाना और जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देना था।
आरोप पत्र में शामिल नाम
जम्मू में विशेष न्यायालय में प्रस्तुत आरोप पत्र में शब्बीर अहमद शाह, सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वकील, जाविद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी के नाम शामिल हैं। हालांकि, सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी है, जिससे उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई समाप्त हो गई है। फिर भी, जांच एजेंसी ने आरोप पत्र में उनके कथित कृत्यों और साजिश में उनकी भूमिका का विस्तृत उल्लेख किया है।
घटनाक्रम का विवरण
एनआईए के अनुसार, यह घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब मारे गए आतंकवादी हिलाल अहमद बेग के जनाजे का जुलूस श्रीनगर के नाज चौराहे से गुजर रहा था। आरोप है कि इस जुलूस में हथियारबंद आतंकवादी भी शामिल हो गए और उन्होंने पुलिस पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए। इसके साथ ही, भारी पथराव किया गया, जिससे सरकारी वाहनों को व्यापक नुकसान हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि हिंसा को सुनियोजित तरीके से भड़काया गया था ताकि कानून व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा जाए।
भारत विरोधी नारे और भाषण
आरोप पत्र के अनुसार, जुलूस का नेतृत्व कर रहे अलगाववादी नेताओं ने भारत विरोधी, पाकिस्तान समर्थक और देश को बांटने वाले नारे लगाए। उन्होंने अपने भाषणों में हथियार उठाने और हिंसक संघर्ष का समर्थन किया। एनआईए का कहना है कि इन भाषणों और नारों का उद्देश्य लोगों को उकसाना, सुरक्षा बलों के खिलाफ माहौल तैयार करना और अलगाववादी विचारधारा को जन समर्थन दिलाना था।
साजिश का उद्देश्य
जांच में यह भी सामने आया है कि जनाजे जैसे संवेदनशील अवसर का उपयोग केवल शोक व्यक्त करने के लिए नहीं, बल्कि भीड़ को भड़काने और हिंसा फैलाने के लिए किया गया। एनआईए के अनुसार, यह पूरी योजना अलगाववादी नेतृत्व की सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार के खिलाफ जन भावना भड़काना और सार्वजनिक अशांति फैलाना था।
आपराधिक आरोप
इस मामले में सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश, हत्या के प्रयास, दंगा करने, लोक सेवकों पर हमला करने और गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। मूल रूप से, यह मामला घटना वाले दिन श्रीनगर के शेरगढी थाना में दर्ज किया गया था, लेकिन इस वर्ष अप्रैल में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर इसकी जांच एनआईए को सौंप दी गई। इसके बाद मामले की नए सिरे से गहन जांच की गई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप पत्र तैयार किया गया। इसी मामले में पिछले सप्ताह जम्मू की अदालत ने शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका भी खारिज कर दी थी।
आतंकवाद और अलगाववाद का सच
यह घटनाक्रम एक बार फिर इस सच्चाई को उजागर करता है कि आतंकवाद और अलगाववाद केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि भीड़ को भड़काने, भावनाओं का दुरुपयोग करने और झूठे प्रचार के माध्यम से भी फैलाया जाता है। किसी आतंकी के जनाजे को हिंसा और भारत विरोधी गतिविधियों का मंच बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज के खिलाफ गंभीर अपराध है। तीन दशकों बाद, यदि ऐसे मामलों में साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जा रही है, तो यह स्पष्ट संदेश है कि कानून का हाथ देर से ही सही, लेकिन दोषियों तक अवश्य पहुंचता है। अलगाववादी सोच और हिंसा के लिए लोकतांत्रिक भारत में कोई स्थान नहीं है।