उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की
उमर खालिद, जो दिल्ली दंगों के मामले में पांच साल से जेल में हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जमानत याचिका के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है। उन्होंने खुली अदालत में सुनवाई की मांग की है, यह तर्क देते हुए कि उनके खिलाफ अन्य आरोपियों के समान सबूत हैं। जानें इस मामले में आगे क्या होगा और खालिद की कानूनी लड़ाई का क्या असर पड़ेगा।
Apr 14, 2026, 13:32 IST
उमर खालिद की न्यायालय में नई याचिका
दिल्ली दंगों के मामले में पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ता उमर खालिद ने एक बार फिर से न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। खालिद ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जनवरी 2026 को उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज करने के निर्णय के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है। इस याचिका के माध्यम से उन्होंने न केवल पिछले निर्णय की समीक्षा की मांग की है, बल्कि एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक अनुरोध भी किया है। उन्हें दिल्ली पुलिस ने 13 सितंबर 2020 को गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम, यानी यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। तब से वे न्यायिक हिरासत में हैं। 13 अप्रैल 2026 को दायर की गई अपनी नई याचिका में खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि उनकी पुनर्विचार याचिका की सुनवाई ओपन कोर्ट में की जाए।
खुली अदालत में सुनवाई की मांग
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया। सिब्बल ने तर्क दिया कि चूंकि यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबे समय तक जेल में रहने से संबंधित है, इसलिए इसे खुली अदालत में सुनना उचित होगा। अदालत ने इस पर विचार करने का संकेत दिया है और इसे बुधवार या गुरुवार तक सूचीबद्ध करने की संभावना जताई है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने उमर खालिद और शजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। उस समय अदालत ने अपने 123 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि खालिद के खिलाफ आरोप सही हैं। अदालत ने दिल्ली पुलिस के इस तर्क को स्वीकार किया कि खालिद दंगों की योजना बनाने, फंड जुटाने और भीड़ को उकसाने में मुख्य भूमिका में थे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यूएपीए की धारा 43 डी उपधारा पांच के तहत यदि अदालत को लगता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।
समानता के सिद्धांत पर आधारित याचिका
खालिद की नई कानूनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण आधार समानता का सिद्धांत है। जनवरी के उसी आदेश में, जहां शजील इमाम और उमर खालिद की जमानत खारिज की गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने पांच अन्य सह-आरोपियों को जमानत दी थी। खालिद के वकीलों का तर्क है कि उनके खिलाफ भी वही सबूत और गवाह हैं जो अन्य पांच आरोपियों के खिलाफ थे, जिन्हें जमानत मिल चुकी है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि खालिद पिछले 67 महीनों से जेल में हैं और मुकदमे की गति बेहद धीमी है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
पुनर्विचार याचिका की सफलता की संभावना
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्विचार याचिकाओं में सफलता की दर बहुत कम होती है, क्योंकि अदालत आमतौर पर अपने फैसले को अंतिम मानती है जब तक कि रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट गलती न हो। उमर खालिद ने कपिल सिब्बल के माध्यम से पुनर्विचार याचिका दाखिल की है और सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि उनके पिछले फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।