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उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने संसद में संवाद और बहस की गरिमा पर जोर दिया

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने हाल ही में संसद में विचारों की विविधता और गरिमा के साथ संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रमंडल देशों के संसद अध्यक्षों के सम्मेलन में भाग लेते हुए भारत के समृद्ध संसदीय लोकतंत्र का महत्व बताया। राधाकृष्णन ने संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से आगे बढ़ने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
 

संसद में विचारों की विविधता और गरिमा का महत्व

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि विभिन्न विचारों के बीच शालीनता और गरिमा के साथ संवाद, बहस और चर्चा को प्रोत्साहित करना विश्वभर की विधायिकाओं के अध्यक्षों की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।


राधाकृष्णन ने राष्ट्रमंडल देशों के संसद अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन के अवसर पर उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया। उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक संविधान सदन, जो पुराना संसद भवन है, पिछले साढ़े सात दशकों से भारत के जीवंत और समृद्ध संसदीय लोकतंत्र का प्रतीक बना हुआ है।


उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों के बीच सामूहिक सद्भाव और साझा उद्देश्य की भावना को दर्शाता है। राधाकृष्णन ने भारत की सभ्यतागत विचारधारा से प्रेरित संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के महत्व पर जोर दिया।


संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर चर्चा करते हुए, राधाकृष्णन ने विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ संवाद को सुगम बनाने की जिम्मेदारी पर बल दिया।


राज्यसभा के सभापति ने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव भिन्न हो सकते हैं, लेकिन वे समान संसदीय लोकाचार और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता से जुड़े हुए हैं।


उन्होंने यह भी कहा कि पीठासीन अधिकारी विधायिका की गरिमा और जनता की आकांक्षाओं के अंतिम संरक्षक होते हैं, जिन्हें लोकतंत्र के पवित्र सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवस्थित आचरण के बीच संतुलन बनाए रखने का दायित्व सौंपा गया है।