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उत्तराखंड में नेताओं को दायित्वों का वितरण तेज, नई नियुक्तियों की लहर

उत्तराखंड में नेताओं को दायित्व सौंपने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है, जिसमें लगभग 15 से 20 नेताओं को विभिन्न आयोगों और परिषदों में नई जिम्मेदारियां दी गई हैं। इस बार बलजीत सोनी जैसे प्रमुख नेताओं को भी शामिल किया गया है। सरकार का यह कदम संगठन के भीतर संतुलन बनाने और कार्यकर्ताओं को सम्मानजनक जिम्मेदारी देने के उद्देश्य से है। जानें इस प्रक्रिया के पीछे की राजनीति और भविष्य की संभावनाएं।
 

उत्तराखंड में दायित्वों का वितरण


देहरादून: उत्तराखंड में नेताओं को दायित्व सौंपने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। हाल ही में लगभग 15 से 20 नेताओं को विभिन्न आयोगों, बोर्डों और परिषदों में उपाध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है। इससे पहले भी सरकार ने दायित्वों की एक विस्तृत सूची जारी की थी। कैबिनेट विस्तार के बाद यह प्रक्रिया फिर से शुरू हुई है।

राज्य में हाल के दिनों में जारी आदेशों से यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकार विभिन्न संस्थाओं में राजनीतिक नियुक्तियों की एक बड़ी संख्या कर रही है। इस बार लगभग 15 से 20 नेताओं को अलग-अलग संस्थाओं में जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।

कैबिनेट विस्तार के बाद से यह अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार संगठन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को समायोजित करने के लिए दायित्वों का वितरण कर सकती है। अब जारी हो रहे आदेशों से यह स्पष्ट हो गया है कि धामी सरकार ने दायित्वों का पिटारा खोल दिया है। हालांकि, इन सभी नियुक्तियों की पूरी सूची अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

सरकार द्वारा जिन प्रमुख नेताओं को दायित्व सौंपा गया है, उनमें विवादों में रहे भाजपा नेता बलजीत सोनी भी शामिल हैं, जिन्हें उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इसके अलावा कई अन्य नेताओं को भी विभिन्न परिषदों और बोर्डों में उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारियां दी गई हैं।

हाल के समय में राज्य स्तरीय खेल परिषद के अध्यक्ष, राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष, राज्य पिछड़ा वर्ग परिषद के उपाध्यक्ष, चाय विकास सलाहकार परिषद के उपाध्यक्ष और युवा कल्याण सलाहकार परिषद के उपाध्यक्ष जैसे पदों पर भी नेताओं को दायित्व सौंपे जा चुके हैं।

केवल उपाध्यक्ष ही नहीं, बल्कि कई नेताओं को विभिन्न आयोगों और समितियों में सदस्य के रूप में भी नामित किया गया है। जिन लोगों को सदस्य के तौर पर जिम्मेदारी दी गई है, उनमें राजपाल कश्यप, रुचि गिरी, राव खाले खां, प्रेमलता, दीप प्रकाश नेवलिया, योगेश रजवार और मनोज गौतम जैसे नाम शामिल हैं।

दायित्वों के माध्यम से सरकार संगठन के भीतर संतुलन बनाने और कार्यकर्ताओं को सम्मानजनक जिम्मेदारी देने का प्रयास कर रही है। खासकर चुनावी राजनीति में सक्रिय नेताओं और कार्यकर्ताओं की संख्या अधिक होने पर, सरकार के लिए उन्हें समायोजित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में आयोग, बोर्ड और परिषद जैसे संस्थान राजनीतिक नियुक्तियों का एक बड़ा माध्यम बन जाते हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में दायित्वों का वितरण नया नहीं है। राज्य गठन के बाद पहली निर्वाचित सरकार के दौरान भी इस तरह की नियुक्तियां चर्चा में रही थीं। उस समय नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार पर यह आरोप लगा था कि बड़ी संख्या में राजनीतिक दायित्व बांटे गए थे।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में सरकारें बड़े पैमाने पर दायित्व बांटने से बचती रही हैं। इसके पीछे कई कारण रहे हैं, जिनमें राजनीतिक आलोचना और वित्तीय भार शामिल हैं। अब एक बार फिर उत्तराखंड में दायित्वों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। धामी सरकार के मौजूदा कार्यकाल में कितने नेताओं को दायित्व दिए गए हैं, इसका आधिकारिक आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि पिछले चार वर्षों में यह संख्या लगातार बढ़ती रही है। अनुमान है कि अब तक लगभग 80 नेताओं को विभिन्न आयोगों, बोर्डों और परिषदों में जिम्मेदारियां दी जा चुकी हैं। आने वाले समय में दायित्वों की सूची और लंबी हो सकती है.