उत्तराखंड में कांग्रेस के भीतर बढ़ती गुटबाजी: हरीश रावत की नाराजगी का असर
कांग्रेस में हरीश रावत की नाराजगी
उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह कुंजवाल ने स्पष्ट किया है कि पार्टी हरीश रावत को नाराज करके सत्ता में वापसी नहीं कर सकती। इस पर हरक सिंह रावत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। हरीश रावत एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार कारण चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेद हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस अपने नेताओं के बीच बढ़ती खींचतान को संभालने में असफल नजर आ रही है, जिससे संगठन की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं.
हाल ही में, हरीश रावत ने 15 दिनों के लिए राजनीति से दूरी बनाने का संकेत दिया, जो उनकी नाराजगी को दर्शाता है। यह निर्णय तब आया जब दिल्ली में कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें कई नेताओं को पार्टी में शामिल किया जाना था। इस बैठक में राजकुमार ठुकराल जैसे कई नामों पर चर्चा हुई। हरीश रावत अपने कुछ करीबी सहयोगियों की पार्टी में वापसी चाहते थे, जिनमें रामनगर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी का नाम भी शामिल था.
संजय नेगी के नाम पर कुछ नेताओं ने आपत्ति जताई, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। इस घटनाक्रम से नाराज होकर हरीश रावत बैठक छोड़कर चले गए। उन्हें वापस बुलाने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी नाराजगी स्पष्ट थी। दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने राजनीति से अस्थायी दूरी बनाने का ऐलान किया, जिसे उनके असंतोष के रूप में देखा जा रहा है.
इस पर गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि पार्टी हरीश रावत को नाराज करके सत्ता में वापसी नहीं कर सकती। हरक सिंह रावत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी, यह कहते हुए कि कांग्रेस किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। धारचूला से विधायक हरीश धामी ने भी विरोध जताया, यह कहते हुए कि अगर हरीश रावत का अपमान किया गया तो वे सामूहिक इस्तीफा देने पर मजबूर हो सकते हैं. इस बयान ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को और उजागर किया.
कांग्रेस नेताओं की आंतरिक कलह से बीजेपी को होगा फायदा
पूर्व विधायक रणजीत सिंह रावत ने भी हरीश रावत पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव हरीश रावत के नेतृत्व में लड़े गए थे, और पार्टी को दोनों बार हार का सामना करना पड़ा। उनका मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो 2027 में भी परिणाम अलग नहीं होंगे। इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस दो गुटों में बंटी हुई है। एक ओर हरीश रावत समर्थक हैं, जबकि दूसरी ओर उनके विरोधी खड़े हैं। इस आंतरिक कलह का सीधा फायदा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है, जो पहले से ही मजबूत स्थिति में है.
राजनीतिक कदम सोच-समझकर उठाते हैं हरीश रावत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरीश रावत एक अनुभवी नेता हैं और वे अपने राजनीतिक कदम सोच-समझकर उठाते हैं। उनका यह कदम केवल नाराजगी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दबाव भी हो सकता है। उनके परिवार के कई सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं, उनकी बेटी अनुपमा रावत विधायक हैं, जबकि उनके बेटे भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में टिकट वितरण को लेकर भी पार्टी के भीतर असहमति बढ़ सकती है.
कुल मिलाकर, कांग्रेस के भीतर बढ़ती यह गुटबाजी 2027 के चुनाव से पहले पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो पार्टी को एक बार फिर सत्ता से दूर रहना पड़ सकता है.