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उच्चतम न्यायालय ने जियोस्टार को दिल्ली उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया

उच्चतम न्यायालय ने जियोस्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह टेलीविजन चैनल शुल्क से संबंधित याचिका में बिना संशोधन के दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख करे। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में ट्राई के नियमों और शुल्क आदेशों के बीच अंतर स्पष्ट किया। जियोस्टार ने पहले भी उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं, जो अब लंबित हैं। जानें इस मामले में अदालत का क्या कहना है और आगे की प्रक्रिया क्या होगी।
 

उच्चतम न्यायालय का निर्देश

नई दिल्ली, चार अगस्त: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को जियोस्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह टेलीविजन चैनल शुल्क से संबंधित भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के नियामकीय ढांचे के कुछ हिस्सों को चुनौती देने के लिए बिना किसी संशोधन के दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख करे। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी से कहा कि उन्हें अपनी याचिका के लिए उच्च न्यायालय जाना चाहिए। पीठ ने जियोस्टार द्वारा दायर स्थानांतरण याचिका का निस्तारण कर दिया।


प्रसारक ने विधि कंपनी करनजावाला एंड कंपनी के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। पीठ ट्राई की नियामकीय प्रणाली से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें शुल्क आदेश, अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की सीमा और केबल व डीटीएस वितरण से जुड़े रियायती ढांचे जैसे मुद्दे शामिल थे।


जियोस्टार का पक्ष रखने के लिए पीठ के समक्ष उपस्थित रोहतगी ने तर्क किया कि ट्राई के नियम और शुल्क आदेश ‘आंतरिक रूप से जुड़े और परस्पर संबंधित’ हैं, भले ही वे अलग-अलग अधिकारों से उत्पन्न हुए हों। उन्होंने दोनों के बीच भेद करते हुए कहा कि नियम विधायी अधिकार के तहत आते हैं और इसलिए, इन्हें केवल उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। जबकि, शुल्क आदेश प्रशासनिक प्रकृति के होते हैं और दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील अधिकरण (टीडीसैट) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।


उन्होंने कहा, ‘शुल्क आदेश और नियामकीय ढांचा एक साथ जारी किए गए थे। एक विधायी शक्ति के तहत और दूसरा प्रशासनिक शक्ति के तहत।’ रोहतगी ने इस ढांचे के तहत ‘सब्सक्राइबर’ की परिभाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि विनियमन के अनुसार, शुल्क तय करने के मामले में सैकड़ों टेलीविज़न सेट वाले लग्जरी होटल और एक शयनकक्ष वाले मकान को एक ही श्रेणी में रखा गया है। उन्होंने कहा, ‘अगर कोई होटल प्रति कमरा 50,000 रुपये का शुल्क ले रहा है, तो सिग्नल के वाणिज्यिक उपयोग और घर में उपयोग के बीच भेद होना चाहिए।’


उन्होंने कहा, ‘दोनों के लिए एक ही शुल्क नहीं हो सकता। यह सेब और संतरे की तुलना करने जैसा है।’ जियोस्टार ने 2014 और 2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं, जिसमें नियमों और शुल्क आदेश दोनों को चुनौती दी गई थी। ये याचिकाएं इसलिए लंबित रहीं क्योंकि टीडीसैट के समक्ष चल रही कार्यवाही से संबंधित समान मुद्दे पहले से ही उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन थे।


रोहतगी ने कहा कि प्रसारक के यह कहने के बावजूद कि किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है, उच्च न्यायालय ने बिना कारण याचिका में संशोधन का निर्देश दिया और साथ ही जुर्माना भी लगाया। उन्होंने बार-बार पूछा, ‘मुकदमा खर्च क्यों?’ और कहा कि आदेश से यह संकेत मिलता है कि अदालत ने पहले ही यह राय बना ली थी कि यदि ऐसा नहीं होता तो याचिकाएं खारिज कर दी जातीं। न्यायालय ने प्रसारक से कहा कि वह याचिका लेकर उच्च न्यायालय जाए।


प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘बेहतर होगा कि आप वापस जाएं। अंतरिम आदेश के पैराग्राफ 4 और 5 के संदर्भ में उच्च न्यायालय में एक अर्जी दें और बताएं कि आप अपनी याचिका में कोई बदलाव नहीं करना चाहते हैं।’ वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि प्रसारक स्थानांतरण याचिका वापस ले लेगा और उच्च न्यायालय में उचित अर्जी दाखिल करेगा।