ईरान-अमेरिका संबंधों का ऐतिहासिक टकराव: 1979 की कहानी
दुनिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़
राजनीतिक इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो न केवल अतीत को प्रभावित करती हैं, बल्कि वर्तमान में भी गंभीर टकराव का कारण बनती हैं। ऐसी ही एक घटना में सत्ता परिवर्तन, रिश्तों में दरार और विश्वास की जगह दुश्मनी ने ले ली। यह कहानी बताती है कि कैसे कभी मित्र रहे देश एक-दूसरे के कट्टर विरोधी बन गए। यह वह समय था जब टकराव की शुरुआत हुई, जिसका प्रभाव आज भी महसूस किया जा रहा है।
4 नवंबर 1979 को अमेरिका के विदेश मंत्रालय में एक फोन की घंटी बजी। यह कॉल ईरान के अमेरिकी दूतावास से थी, जिसमें ऑफिसर एलिजाबेथ स्विफ्ट ने बताया कि ईरानियों ने दूतावास पर हमला कर दिया है। भीड़ दीवार फांदकर अंदर घुस रही थी। दूतावास पर कब्जा होने का खतरा था। स्विफ्ट ने फोन पर कहा कि दूतावास की पहली मंजिल में आग लग गई है और सभी कर्मचारी बाहर भाग रहे हैं। फोन कटने से पहले उनका अंतिम संदेश था- 'हम जा रहे हैं।'
दूतावास पर कब्जा और अमेरिका की प्रतिक्रिया
अगले कुछ मिनटों में अमेरिकी डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया। उनकी आँखों पर पट्टी बांध दी गई, जिससे वे न देख सकें और न बोल सकें। जैसे ही यह खबर अमेरिका में पहुंची, सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई। राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर पल-पल की जानकारी ले रहे थे। कुछ समय बाद, उन्होंने टीवी पर देखा कि तेहरान में अमेरिकी नागरिकों और कर्मचारियों को परेड में ले जाया जा रहा है, जबकि पीछे की भीड़ उनकी हत्या के नारे लगा रही थी। यह दृश्य पूरी दुनिया ने देखा, और अमेरिका को ईरान ने घुटनों पर ला दिया।
ईरान का इस्लामिक रिपब्लिक बनना
1 अप्रैल 1979 को ईरान को इस्लामिक रिपब्लिक घोषित किया गया। लेकिन खुमैनी का बदला अभी बाकी था। वह शाह पहलवी को सजा देना चाहते थे, साथ ही अमेरिका को भी। शाह ने कैंसर के इलाज के बहाने अमेरिका में शरण ली थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर थे। ईरान ने अमेरिका से शाह को लौटाने की मांग की, लेकिन अमेरिका ने मना कर दिया। क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध समाप्त हो चुके थे, लेकिन खुमैनी बदला लेना चाहते थे। 4 नवंबर 1979 को, एक भीड़ अमेरिकी दूतावास की ओर बढ़ी, जो खुमैनी के मौन समर्थन से प्रेरित थी। देखते ही देखते, 66 डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया।