इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: शारीरिक संबंध न बनाना मानसिक क्रूरता
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के संबंधों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी को लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति नहीं देता है, तो यह मानसिक क्रूरता के अंतर्गत आता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना किसी उचित कारण के अपने साथी को यौन संबंध से वंचित करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
कोर्ट का निर्णय
जस्टिस सुनीत कुमार और राजेंद्र कुमार की खंडपीठ ने मानसिक क्रूरता के आधार पर एक दंपत्ति के विवाह को समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक पति-पत्नी का अलग रहना और पत्नी का वैवाहिक बंधन को न मानना इस बात का संकेत है कि शादी टूट चुकी है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पति या पत्नी को एक-दूसरे के साथ जीवन फिर से शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मामले का विवरण
यह मामला एक फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील से संबंधित है, जिसमें पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। पति का आरोप था कि शादी के बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया और उसने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया।
पति ने बताया कि वे कुछ समय तक एक ही छत के नीचे रहे, लेकिन पत्नी ने बाद में अपने माता-पिता के घर में अलग रहने का निर्णय लिया।
तलाक की प्रक्रिया
पति ने 1994 में पत्नी को लेने ससुराल जाने का प्रयास किया, लेकिन पत्नी ने साथ चलने से मना कर दिया। इसके बाद, जुलाई 1994 में पंचायत के माध्यम से पति ने पत्नी को 22 हजार का गुजारा भत्ता देने के बाद तलाक ले लिया।
पत्नी की दूसरी शादी के बाद, पति ने मानसिक क्रूरता और लंबे समय तक परेशान रहने के आधार पर फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री मांगी।
फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट के निर्णय को रद्द कर दिया और पति को तलाक की डिक्री दे दी।