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इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: लिव इन संबंधों को मान्यता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन संबंधों को कानूनी मान्यता देते हुए विवाहित पुरुषों के संबंधों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी महिला के साथ सहमति से रहता है, तो यह अपराध नहीं है। इस निर्णय ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाई और पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई आठ अप्रैल 2026 को होगी।
 

कोर्ट का निर्णय



इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि एक विवाहित पुरुष किसी महिला के साथ सहमति से लिव इन संबंध में रहता है, तो यह कानून के तहत अपराध नहीं है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कहा कि कानून और नैतिकता को अलग-अलग समझा जाना चाहिए। यदि किसी मामले में कानूनी रूप से कोई अपराध नहीं है, तो नैतिकता के आधार पर अधिकारों की रक्षा करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। यह मामला शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर थाने से संबंधित है।


याचिकाकर्ता, एक महिला और नेत्रपाल, ने पुलिस सुरक्षा और गिरफ्तारी से राहत के लिए याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, लेकिन महिला के परिवार वाले इस रिश्ते के खिलाफ हैं और उन्हें हत्या का खतरा है। विपक्ष के वकील ने तर्क दिया कि याचिका दाता शादीशुदा है और किसी अन्य महिला के साथ रहना अपराध है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि दो बालिगों के बीच सहमति से बने संबंध के लिए किसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।


अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की और कहा कि दो बालिगों की सुरक्षा करना पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट के शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में सुरक्षा सुनिश्चित करने की विशेष जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक की होती है। याचिकाकर्ता ने पहले ही पुलिस अधीक्षक शाहजहांपुर को आवेदन दिया था, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए।


अदालत ने निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को अगले आदेश तक गिरफ्तार न किया जाए। इसके साथ ही महिला के परिवार के सदस्यों को याचिकाकर्ताओं के घर में प्रवेश करने या उनसे किसी भी माध्यम से संपर्क करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति 24 घंटे के भीतर संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जाए। मामले की अगली सुनवाई आठ अप्रैल 2026 को होगी।