इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप में नहीं माना जा सकता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। यह निर्णय एक बुजुर्ग दंपति की याचिका को खारिज करते हुए दिया गया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता मांगने का प्रयास किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कानून में कोई लिखित आदेश नहीं है, तब तक नैतिक दायित्व को कानूनी रूप से नहीं थोप सकते। इस निर्णय के पीछे की पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें।
Mar 29, 2026, 14:04 IST
कोर्ट का निर्णय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय दिया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी एक बुजुर्ग दंपति की याचिका को खारिज करते हुए की गई, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता मांगने का प्रयास किया था।
मामले का विवरण
एक बुजुर्ग दंपति, जिनका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था, की 2021 में मृत्यु हो गई। दंपति का कहना था कि वे अनपढ़ हैं और अपने बेटे पर पूरी तरह निर्भर थे। बेटे की मृत्यु के बाद, उसकी पत्नी, जो स्वयं भी यूपी पुलिस में कांस्टेबल है, को नौकरी से जुड़े सभी वित्तीय लाभ प्राप्त हुए। बुजुर्गों ने तर्क दिया कि उनकी बहू का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने सास-ससुर का ख्याल रखे, क्योंकि उसकी आय पर्याप्त है।
नैतिक और कानूनी दायित्व में अंतर
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने 4 फरवरी को अपने निर्णय में कहा कि समाज में बहू का अपने सास-ससुर की देखभाल करना एक नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन कानून में इसका कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कानून में कोई लिखित आदेश नहीं है, तब तक नैतिक दायित्व को कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144
बुजुर्ग दंपति ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 144 के तहत राहत की मांग की थी। अदालत ने इस पर विचार करते हुए कहा कि यह धारा केवल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को गुजारा भत्ता दिलाने का अधिकार देती है। कानून निर्माताओं ने जानबूझकर 'सास-ससुर' को इस सूची से बाहर रखा है, इसलिए इस कानून के तहत बहू को सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए आदेश नहीं दिया जा सकता।
अंतिम निर्णय
उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के पूर्व निर्णय को सही ठहराते हुए बुजुर्गों की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि बहू को नौकरी 'अनुकंपा' के आधार पर मिली थी। अंत में, कोर्ट ने दोहराया कि गुजारा भत्ता केवल वही लोग मांग सकते हैं जो कानून द्वारा निर्धारित विशेष श्रेणियों में आते हैं।