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इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: निकाह हलाला और तीन तलाक़ पर यौन शोषण की रोकथाम

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निकाह हलाला और तीन तलाक़ जैसी प्रथाओं के माध्यम से महिलाओं के यौन शोषण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों के नाम पर अपराधों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस मामले में एक महिला ने कम उम्र में विवाह और बार-बार यौन शोषण का आरोप लगाया है। कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच जारी रखने का आदेश दिया है। यह निर्णय समाज में प्रथाओं के गलत इस्तेमाल के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम है।
 

महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ कोर्ट का सख्त रुख

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निकाह हलाला और तीन तलाक़ जैसी प्रथाओं के माध्यम से महिलाओं का यौन शोषण सहन नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत कानूनों के नाम पर अपराधों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने यह टिप्पणी उस समय की जब वे एक महिला के पूर्व पति, मौलवी, रिश्तेदारों और अन्य आरोपियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिनमें FIR को रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की गई थी। यह मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से संबंधित है, जहां एक महिला ने कम उम्र में विवाह, तीन तलाक़, निकाह हलाला और पुनर्विवाह के बहाने बार-बार यौन शोषण का आरोप लगाया था। निकाह हलाला की प्रक्रिया में, तलाकशुदा महिला को अपने पूर्व पति से पुनर्विवाह करने से पहले किसी अन्य पुरुष से विवाह करना पड़ता है और फिर उसे उससे अलग होना होता है। ट्रिपल तलाक, जिसे 'तलाक-ए-बिद्दत' भी कहा जाता है, एक ऐसी प्रथा है जिसमें मुस्लिम पुरुष एक बार में तीन बार "तलाक" कहकर अपनी पत्नी को तलाक दे देता है। भारत में 2019 में इस प्रथा को अवैध घोषित किया गया था।


कोर्ट ने गंभीर आरोपों पर जताई चिंता

आरोपियों की दलीलों को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपों में गंभीरता है और ये कानून के खिलाफ प्रतीत होते हैं। बेंच ने कहा कि इस मामले में अपनाई गई प्रथाएं समाज के लिए एक "काला अध्याय" हैं और ये संवैधानिक मूल्यों, समानता और मानव गरिमा के खिलाफ हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ये गतिविधियाँ न केवल कानून के तहत अपराध हैं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को भी झकझोर देती हैं। इसके साथ ही, अदालत ने कहा कि आपराधिक गतिविधियों को बचाने के लिए व्यक्तिगत कानूनों का उपयोग ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिनमें 'निकाह हलाला' और उससे जुड़ी प्रथाओं के गलत इस्तेमाल के जरिए एक महिला के यौन शोषण के आरोप में नौ लोगों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की गई थी। आरोपियों ने केस की सुनवाई के दौरान गिरफ्तारी से सुरक्षा की भी मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस चरण पर जांच में दखल देने का कोई आधार नहीं पाया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया एक नाबालिग के साथ सुनियोजित गैंगरेप का मामला प्रतीत होता है और इसकी गहन जांच आवश्यक है।


महिला के साथ हुई घटनाओं का विवरण

FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला को अप्रैल 2015 में, जब वह लगभग 15 वर्ष की थी, अज़हर नवाज़ से विवाह के लिए मजबूर किया गया था। जनवरी 2016 में अज़हर द्वारा तीन तलाक़ देने के बाद, उसे 2017 में अज़हर से पुनर्विवाह करने से पहले मौलाना क़य्यूम के साथ निकाह हलाला करने के लिए मजबूर किया गया। 'लॉबीट' (LawBeat) की रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने यह भी देखा कि पहले हलाला के समय वह नाबालिग थी। FIR में यह भी आरोप लगाया गया है कि 2021 में एक और तलाक़ के बाद, अज़हर ने सुलह की कोशिश की। उसके भाई शाहनवाज़ चौधरी और रिश्तेदार हकीम निशात उर्फ़ निशात ने कथित तौर पर महिला से कहा कि चूंकि उसे दो बार तलाक़ दिया जा चुका है, इसलिए उसे अज़हर से पुनर्विवाह करने से पहले दो बार निकाह हलाला करना होगा। FIR के अनुसार, इस रस्म को पूरा करने के बहाने शाहनवाज़ और निशात ने कथित तौर पर फरवरी 2025 में महिला के साथ बलात्कार किया और विरोध करने पर उसे और उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी दी।


नकली विवाह का आरोप

LawBeat की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला ने आगे आरोप लगाया कि मौलाना नदीम ने अकील, शाहनवाज़ चौधरी, हकीम निशात और अज़हर नवाज़ की मदद से एक नकली विवाह कराया। इसका उद्देश्य उसे यह विश्वास दिलाना था कि उसने अज़हर से कानूनी रूप से पुनर्विवाह कर लिया है, ताकि वह उसके साथ फिर से वैवाहिक संबंध बनाने के लिए तैयार हो जाए। LawBeat के अनुसार, याचिकाकर्ताओं (जिनमें तैयब, शाहनवाज़ चौधरी, हकीम निशात, आसिम और मुर्तज़ा उर्फ़ कारी मुर्तज़ा शामिल थे) ने अदालत में दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 'निकाह हलाला' को मान्यता प्राप्त है और 2016 में 'तीन तलाक़' कानूनी रूप से वैध था। उन्होंने यह भी तर्क किया कि FIR जोड़े की बेटी की कस्टडी और संपत्ति से जुड़े चल रहे विवाद के कारण दर्ज कराई गई थी। साथ ही, उन्होंने दावा किया कि कथित घटनाओं में कुछ आरोपियों की भूमिका बहुत मामूली थी। हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जांच के प्रारंभिक चरण में FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच जारी रहेगी और आरोपों की जांच करने वाली एजेंसी द्वारा व्यापक जांच की आवश्यकता है।