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इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में शामिल होने से नहीं रोका जा सकता

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने आरक्षण प्रणाली पर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में शामिल होने से नहीं रोका जा सकता, यदि वे सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से अधिक अंक प्राप्त करते हैं। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक करार दिया है, जिससे भर्ती प्रक्रियाओं में आरक्षण के नियमों पर नई बहस छिड़ गई है। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई को होगी।
 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला

प्रयागराज/लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने आरक्षण प्रणाली और प्रतियोगी परीक्षाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे मुख्य परीक्षा में शामिल होने से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि वह आरक्षित वर्ग के कट-ऑफ में नहीं आ सका। न्यायालय ने इसे पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया है।


हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,आरक्षित वर्ग के अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को बाहर करना असंवैधानिक



संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन
इस मामले की सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणियाँ कीं। कोर्ट ने कहा कि अधिक अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को परीक्षा प्रक्रिया से बाहर रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16(1) (अवसर की समानता) का उल्लंघन है। योग्यता के बावजूद तकनीकी और विसंगतिपूर्ण नियमों के कारण प्रतिभाशाली छात्रों को रोकना उचित नहीं है।


भर्ती विज्ञापन की शर्तों पर रोक
इन महत्वपूर्ण टिप्पणियों के साथ, न्यायालय ने स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी भर्ती परीक्षा विज्ञापन की विवादित शर्त पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही, कोर्ट ने राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा 9 जनवरी 2020 को जारी किए गए कार्यालय आदेश पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद आरक्षण के नियमों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। माननीय न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 26 मई की तारीख तय की है।