इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा को सर्वोच्च न्यायालय से झटका
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा को एक महत्वपूर्ण झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे संसदीय पैनल को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता में पीठ ने इस याचिका को अस्वीकार कर दिया। 16 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी थी, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके खिलाफ जांच हेतु एक समिति के गठन को "एकतरफा" बताया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने न्यायमूर्ति वर्मा का प्रतिनिधित्व करते हुए तर्क किया कि 1968 अधिनियम की धारा 3(2) के तहत समिति का गठन उनके अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद के दोनों सदनों में निष्कासन के प्रस्ताव एक ही दिन जारी किए गए थे, लेकिन अध्यक्ष ने समिति का गठन एकतरफा किया। न्यायालय ने याचिका खारिज करने से पहले अपना निर्णय सुरक्षित रखा था।
14 मार्च को नई दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास पर जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया गया था। 16 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने जांच समिति के गठन को चुनौती देने वाली न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी और लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय तथा संसद के महासचिवों को नोटिस जारी किए।
आंतरिक जांच और समिति की रिपोर्ट
इससे पहले, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आंतरिक जांच शुरू की थी और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति ने 4 मई को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें न्यायमूर्ति वर्मा को कदाचार का दोषी पाया गया।