आरबीआई के नए नियम: बैंकिंग प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव
बैंकिंग क्षेत्र में नया युग
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके लिए लंबे समय से तैयारी की जा रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो लोन देने की प्रक्रिया से लेकर मुनाफा दिखाने तक कई पहलुओं को प्रभावित कर सकते हैं। पहले, बैंक लोन देते थे और ग्राहक किस्तें चुकाते थे। यदि किसी कारणवश ग्राहक को दिक्कत होती थी, तो कुछ समय तक इंतजार किया जाता था। लेकिन अब आरबीआई ने कहा है कि अब इंतजार का समय समाप्त हो गया है। अब बैंकों को पहले से ही संभावित खतरों की पहचान करनी होगी और सुरक्षा उपाय करने होंगे।
नए नियमों का उद्देश्य
इसी कारण नए नियमों में एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस (ईसीएल) फ्रेमवर्क को शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि यदि बैंक को लगता है कि किसी लोन में भविष्य में नुकसान हो सकता है, तो उसे पहले से ही उस राशि को अलग रखना होगा। पहले, नुकसान होने के बाद प्रावधान किया जाता था, लेकिन अब संभावित नुकसान के आधार पर प्रावधान किया जाएगा।
तीन स्तरों का नया ढांचा
आरबीआई ने लोन खातों को तीन स्तरों में विभाजित करने का निर्णय लिया है। पहले स्तर, जिसे स्टेज 1 कहा जाता है, में सामान्य खाते होंगे। इन पर अगले 12 महीनों में संभावित नुकसान का आकलन किया जाएगा। दूसरे स्तर, स्टेज 2 में वे खाते होंगे जिनमें खतरे की स्थिति है। यदि ग्राहक की वित्तीय स्थिति कमजोर है, तो बैंक को पूरे लोन कार्यकाल के संभावित नुकसान का आकलन करना होगा। तीसरे स्तर, स्टेज 3 में तनावग्रस्त या खराब माने जाने वाले खाते शामिल होंगे, जिनके लिए लाइफटाइम नुकसान का प्रावधान करना होगा।
महत्वपूर्ण समयसीमा
नए नियमों में 30 दिन और 90 दिन की अवधि महत्वपूर्ण हो गई है। यदि कोई लोन 30 दिन तक बकाया रहता है, तो इसे खतरे का प्रारंभिक संकेत माना जाएगा। बैंक को तुरंत सतर्क रहना होगा। यदि लोन 90 दिन से अधिक बकाया रहता है, तो इसे एनपीए यानी खराब कर्ज माना जाएगा। इसका मतलब है कि 30 दिन चेतावनी है और 90 दिन कार्रवाई का समय है।
ग्राहक की संपूर्ण तस्वीर
पहले, यदि किसी ग्राहक का एक लोन खराब हो जाता था, तो अन्य खाते सामान्य रह सकते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। आरबीआई ने बॉरोअर लेवल क्लासिफिकेशन लागू किया है। यदि किसी ग्राहक का एक बड़ा लोन एनपीए बनता है, तो बैंक को उस ग्राहक के अन्य लोन को भी नए दृष्टिकोण से देखना होगा। इसका अर्थ है कि अब ग्राहक को टुकड़ों में नहीं, बल्कि संपूर्णता में देखा जाएगा।