असम विधानसभा चुनाव 2026: भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा
असम विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियां जोरों पर हैं, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। भाजपा ने 88 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, जबकि कांग्रेस भी अपनी ताकत के साथ मैदान में है। इस चुनाव में घुसपैठ, नागरिकता, भूमि अतिक्रमण और महिलाओं के मुद्दे प्रमुख हैं। मतदाता संख्या लगभग 2.5 करोड़ है, और चुनावी माहौल गरमाया हुआ है। क्या भाजपा अपनी सत्ता बनाए रख पाएगी या असम की जनता नया फैसला सुनाएगी? जानें पूरी कहानी।
Mar 19, 2026, 17:03 IST
असम विधानसभा चुनाव की तैयारी
असम विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, और राजनीतिक परिदृश्य पर हलचल मची हुई है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। भारतीय जनता पार्टी ने 88 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जलुकबारी सीट से फिर से चुनावी मैदान में उतरने के लिए तैयार हैं। यह चुनाव उनके लिए केवल सत्ता बनाए रखने का नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर बन गया है।
चुनावी समीकरण और गठबंधन
इस बार का चुनावी समीकरण काफी दिलचस्प है। 126 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 64 सीटें चाहिए, और भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अपनी रणनीति को स्पष्ट कर दिया है। सीटों के बंटवारे के अनुसार, भाजपा 89, असम गण परिषद 26 और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। यह गठबंधन यह दर्शाता है कि भाजपा सत्ता को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती।
उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया
पार्टी ने 11 मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया है और केवल 5 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है। यह निर्णय बदलाव का संकेत देता है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या यह एक रणनीतिक कदम है या पार्टी के भीतर असंतोष का परिणाम?
कांग्रेस की चुनौती
कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में है। गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी ने 65 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है और भाजपा को सीधी चुनौती देने का प्रयास कर रही है। हालांकि, असली मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं है। बदरुद्दीन अजमल, अखिल गोगोई और अन्य क्षेत्रीय दलों का प्रभाव भी कई सीटों पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
मुख्य मुद्दे
इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा घुसपैठ और नागरिकता है। एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दे फिर से लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गए हैं। भाजपा खुद को सख्त रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि निर्दोष लोगों को परेशान किया जा रहा है। खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह मुद्दा चुनावी दिशा को बदल सकता है।
भूमि अतिक्रमण और सामाजिक मुद्दे
भूमि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी चुनावी माहौल को गरमाने का काम कर रही है। सरकार का दावा है कि उसने जंगल और सरकारी जमीन को मुक्त कराया है, लेकिन विपक्ष इसे मानवीय संकट बता रहा है। हजारों लोग बेघर हुए हैं, और यह दर्द वोट में तब्दील हो सकता है।
महिलाओं और युवाओं के मुद्दे
महिलाओं के लिए योजनाएं, हर महीने आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसर भाजपा के प्रमुख चुनावी हथियार हैं। लेकिन विपक्ष का कहना है कि अपराध कम नहीं हुए और योजनाओं का लाभ सभी को नहीं मिला। युवाओं के लिए 1.6 लाख नौकरियों का दावा भी चुनावी बहस का केंद्र बन गया है।
मतदाता और चुनावी भविष्य
इस बार लगभग 2.5 करोड़ मतदाता चुनाव में भाग लेंगे, जिसमें पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या लगभग समान है। पिछले चुनाव में 82 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था, और इस बार भी भारी भागीदारी की उम्मीद है।
असम का राजनीतिक परिदृश्य
असम में राजनीतिक समीकरण स्पष्ट हैं, लेकिन मुकाबला आसान नहीं है। भाजपा के पास मजबूत संगठन और गठबंधन है, जबकि विपक्ष मुद्दों के सहारे वापसी की कोशिश कर रहा है। 9 अप्रैल को मतदान होगा और 4 मई को परिणाम आएंगे। असली सवाल यह है कि क्या भाजपा अपनी सत्ता बनाए रख पाएगी या असम की जनता नया फैसला सुनाएगी?