असम में घुसपैठ का मुद्दा: भाजपा की चुनावी रणनीति
असम में घुसपैठ का मुद्दा आजादी के बाद से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय बना हुआ है। भाजपा इस मुद्दे को अपनी चुनावी रणनीति का केंद्र बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे चुनावी हथकंडा मानती है। जानें कैसे भाजपा ने घुसपैठियों के खिलाफ ठोस कदम उठाने का वादा किया है और इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।
Apr 7, 2026, 15:55 IST
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में घुसपैठ
पिछले कुछ वर्षों में, कई राज्यों में चुनावों के दौरान घुसपैठ एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय बन गया है। हालांकि, असम में यह मुद्दा आजादी के बाद से ही प्रमुख बना हुआ है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बारदोलाई ने 1950 में घुसपैठ के खिलाफ सख्त कानून लाकर इस समस्या का समाधान करने का आश्वासन दिया था। आजादी के लगभग 75 साल बाद, असम के निवासियों में इस समस्या से मुक्ति पाने की उम्मीद जगी है। भारतीय जनता पार्टी इस विश्वास के आधार पर असम में अपनी तीसरी बार जीतने की कोशिश कर रही है।
घुसपैठियों के खिलाफ भाजपा की पहल
इसलिए, भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में घुसपैठ का मुद्दा प्राथमिकता पर है। पार्टी नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में यूसीसी लागू करने के साथ-साथ घुसपैठियों को राज्य से बाहर निकालने का वादा कर रही है। हिमंत बिस्व सरमा की भाजपा सरकार ने नामघरों से अवैध कब्जा हटाने के साथ-साथ 1.50 लाख बीघा भूमि को मुक्त किया है। इससे पार्टी ने घुसपैठियों के खिलाफ ठोस कदम उठाने का संकेत दिया है।
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असम देश का एकमात्र राज्य है, जहां 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू किया गया था। लेकिन समय के साथ, इस पर भरोसा कम होता गया। पहले, अवैध घुसपैठ का मुद्दा केवल चुनावी मुद्दों तक सीमित रहा। कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने भी इससे मुक्ति दिलाने का वादा किया है।
भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप
हालांकि, भाजपा ने इस मुद्दे को 'अस्मिता और सुरक्षा' के रूप में पेश कर कांग्रेस पर वोट बैंक के लिए घुसपैठियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। कांग्रेस इस दावे को चुनावी रणनीति बताकर खारिज कर रही है। भाजपा ने सत्ता में लौटकर घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर निकालने का वादा किया है।