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अमेरिका में नो किंग्स प्रदर्शनों का उभार: ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियों पर विरोध

अमेरिका में नो किंग्स प्रदर्शनों की लहर ने राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों को चुनौती दी है। लाखों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे हैं, जो ईरान युद्ध और इमिग्रेशन नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। जानें इस विरोध के पीछे के कारण और व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया।
 

नो किंग्स प्रदर्शनों का प्रभाव


मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष का असर अब वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है। कई स्थानों पर पेट्रोल और LPG की कमी हो रही है, जबकि विरोध प्रदर्शनों की लहर भी उठ रही है। इजरायल और अमेरिका के हमलों के जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है। इस वैश्विक तनाव के बीच अमेरिका में भी विद्रोह की लहरें उठने लगी हैं। शनिवार को अमेरिका में बड़ी संख्या में लोगों ने नो किंग्स प्रदर्शनों में भाग लिया।

इन प्रदर्शनों ने अमेरिका में राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ उठे इस विरोध ने व्हाइट हाउस की चिंताओं को बढ़ा दिया है। शनिवार को अमेरिका के 3,000 से अधिक शहरों में, साथ ही पड़ोसी देशों कनाडा और मैक्सिको में भी लाखों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। नो किंग्स गठबंधन के बैनर तले यह विरोध प्रदर्शन ट्रंप सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप का शासन एक लोकतांत्रिक नेता के बजाय किसी 'राजा' की तरह हो गया है, जो देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है।

ईरान युद्ध पर गुस्सा
वॉशिंगटन डी.सी. के लिंकन मेमोरियल पर जुटी भीड़ में शामिल कैथरीन अर्नोल्ड ने राष्ट्रपति ट्रंप पर आरोप लगाया कि वह सेना से बचने वाले रहे हैं और अब हमारे बच्चों की जिंदगी को खतरे में डाल रहे हैं। वहीं, कारिना कागान ने ईरान युद्ध को एक मूर्खतापूर्ण और अहंकारी कदम बताया।

इमिग्रेशन पर चिंता
वर्मोंट और मिनेसोटा जैसे स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने इमिग्रेशन डिपार्टमेंट की कार्रवाई को अमानवीय करार दिया। 71 साल से अमेरिका में रह रहे मारियो डेल ओबाल्डिया ने कहा कि यह दुखद है कि लोगों को हमेशा दस्तावेज साथ लेकर चलना पड़ता है, जो अमेरिकी मूल्यों के खिलाफ है।

व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अबीगैल जैक्सन ने इन प्रदर्शनों को खारिज करते हुए इसे ट्रंप विरोधी मानसिकता का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि इन रैलियों में केवल वही पत्रकार रुचि रखते हैं जिन्हें इसके लिए भुगतान किया जाता है।

प्रदर्शनों में युवाओं और बुजुर्गों की भागीदारी
इस प्रदर्शन में युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। थर्ड एक्ट के संस्थापक बिल मैककिबेन ने कहा कि यह अमेरिकी इतिहास का एक कठिन दौर है, जहां लोग वर्तमान शासन को फासीवाद के करीब देख रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि केवल वोट देना ही काफी नहीं है, बल्कि नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना भी आवश्यक है।

तीसरी बार हो रहा प्रदर्शन
यह जानकर अच्छा लगेगा कि अमेरिका में हो रहे नो किंग्स प्रदर्शनों का यह तीसरा चरण है। पिछले साल भी दो बड़े प्रदर्शन हुए थे, जिनमें लाखों लोग शामिल हुए थे। इन प्रदर्शनों के पीछे महंगाई, ईंधन की कीमतें और अर्थव्यवस्था में मंदी जैसी समस्याएं भी शामिल थीं.