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अमेरिका और नाटो के रिश्तों में तनाव: ट्रंप के नए बयान पर चर्चा

अमेरिका और नाटो के बीच संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है, खासकर राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया बयानों के बाद। ट्रंप ने नाटो के सदस्य देशों पर निशाना साधते हुए कहा है कि अमेरिका के लिए इस गठबंधन के साथ रहना अनिवार्य नहीं है। उनका यह रुख न केवल अमेरिका-यूरोप संबंधों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि वैश्विक सुरक्षा ढांचे पर भी गहरा असर डाल सकता है। क्या ट्रंप की यह सोच अमेरिका की पारंपरिक साझेदारियों को बदलने का संकेत है? जानें इस लेख में।
 

अमेरिका-नाटो संबंधों में खटास


हाल के दिनों में अमेरिका और नाटो के बीच संबंधों में स्पष्ट खटास देखी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो के सदस्य देशों पर लगातार निशाना साधते हुए यह संकेत दिया है कि वह इस गठबंधन से संतुष्ट नहीं हैं। 27 मार्च को दिए गए एक बयान में ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका के लिए नाटो के साथ खड़ा रहना अनिवार्य नहीं है। उनके इस बयान ने ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप पहले भी नाटो देशों से रक्षा खर्च में कमी को लेकर नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन इस बार उनका रुख और भी सख्त नजर आया।

ट्रंप के इस बयान को इस रूप में देखा जा रहा है कि वह अमेरिका की भूमिका को सीमित करने या नाटो से दूरी बनाने का मन बना रहे हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह न केवल अमेरिका-यूरोप संबंधों के लिए एक बड़ा झटका होगा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा ढांचे पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। ट्रंप ने मियामी में एक निवेश फोरम के दौरान अपनी नाराजगी व्यक्त की, जिसका केंद्र नाटो और विशेष रूप से उसके यूरोपीय सदस्य देश थे।

ट्रंप ने यह भी कहा कि जब अमेरिका ईरान के साथ संघर्ष में एक महीने का समय बिता चुका है, तब भी यूरोपीय सहयोगियों ने खुलकर उसका समर्थन नहीं किया। उन्होंने निराशा व्यक्त की कि जिन देशों को वह अपने साझेदार मानते हैं, वही इस कठिन समय में उनसे दूर रहे। असल में, अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई का निर्णय अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ साझा नहीं किया था, जिसके कारण कई यूरोपीय नेताओं ने इसका विरोध किया। इस घटनाक्रम ने नाटो के भीतर मतभेदों को फिर से उजागर कर दिया है, जिससे अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ता नजर आ रहा है।

ट्रंप ने अपने बेबाक अंदाज में सहयोगी देशों को लेकर एक बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका हमेशा उनके साथ खड़ा रहा है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि वहां बने रहने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। बातचीत के दौरान उन्होंने तंज भरे अंदाज में कहा, 'क्या यह ब्रेकिंग स्टोरी है? शायद हां… लेकिन सच यही है।' उन्होंने दोहराया कि जब अन्य देश अमेरिका के हितों का समर्थन नहीं करते, तो अमेरिका को भी उनके लिए खड़ा रहने की कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए। उनके बयान से यह स्पष्ट होता है कि वे पारंपरिक वैश्विक साझेदारियों पर पुनर्विचार के पक्ष में हैं और मानते हैं कि रिश्ते बराबरी के आधार पर होने चाहिए।

ट्रंप ने 2024 के चुनावी अभियान के दौरान एक बयान देकर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। उन्होंने कहा था कि जो यूरोपीय देश नाटो के तहत अपनी रक्षा पर तय खर्च नहीं करते, उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए व्लादिमीर पुतिन को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इस बयान ने ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया था। हालांकि, 2025 में स्थिति कुछ हद तक सुधरी और ट्रंप तथा कई यूरोपीय नेताओं के बीच संवाद बढ़ा। ऐसा लगा कि दोनों पक्ष पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन 2026 में यह संतुलन फिर से बिगड़ गया, जब वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच तनाव बढ़ गया।