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अमेरिका-ईरान वार्ता का नतीजा: ईरान की कूटनीतिक मजबूती

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई वार्ता का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। ईरान ने अमेरिकी शर्तों को ठुकरा दिया है, जिससे उसकी कूटनीतिक मजबूती का पता चलता है। ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत की तुलना में अमेरिका की स्थिति कमजोर होती जा रही है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अपने लिए एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बना लिया है। जानें इस संघर्ष के पीछे की रणनीतियों और ईरान की ताकत के बारे में।
 

इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता


अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चल रही वार्ता का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है। ईरान ने अमेरिका की शर्तों को मानने से साफ इनकार कर दिया है। चाहे वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अधिकार की बात हो या यूरेनियम संवर्धन की, ईरान ने सभी अमेरिकी प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। अमेरिका, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेता है और जिसका रक्षा बजट ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था से अधिक है, 31 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ सुपरपावर है। वहीं, ईरान की अर्थव्यवस्था 404 से 464 बिलियन डॉलर के बीच है, जो गंभीर महंगाई और कमजोर मुद्रा से जूझ रही है। ईरान के पास तेल के भंडार हैं, लेकिन प्रतिबंधों के कारण वह उन्हें बेच नहीं पा रहा है। ऐसे में, ईरान अमेरिका के सामने कैसे खड़ा है?

ईरान की स्थिति का विश्लेषण
ईरान के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए बहुत कुछ है। जितना लंबा युद्ध चलेगा, अमेरिका को उतनी ही आर्थिक चोट पहुंचेगी। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदियों को सख्त कर मोटी कमाई कर ली है। भले ही ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर्स और नागरिकों को खोया हो, लेकिन आर्थिक रूप से उसे होर्मुज से एक मजबूत राजस्व मॉडल मिल गया है।

अमेरिका के सामने ईरान की कूटनीतिक ताकत
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे की वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हुई। यदि आप सोचते हैं कि इस बातचीत में ईरान ने कुछ खोया है, तो यह गलत है। ईरान ने अपनी शर्तों पर इस वार्ता को समाप्त किया है। ईरान समझ चुका है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज उसके लिए एक महत्वपूर्ण चिराग है, जिससे वह न केवल अमेरिका को दबा सकता है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज भी अपने हाथ में रख सकता है।

अमेरिका को मिली दोहरी हार
मध्य पूर्व के युद्ध ने अमेरिका को बैकफुट पर ला दिया है। होर्मुज को बंद करके ईरान ने युद्ध की गर्मी को व्हाइट हाउस तक पहुंचा दिया है। तेल की कीमतों में वृद्धि से अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है। लोग ट्रंप प्रशासन के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। अमेरिका इस युद्ध को जल्द समाप्त करना चाहता है, क्योंकि यदि यह लंबा चला, तो मिड-टर्म चुनाव में जोखिम बढ़ सकता है। इस युद्ध के कारण अमेरिका को 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो चुका है।

ईरान की आर्थिक स्थिति में सुधार
इस युद्ध ने ईरान को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन आर्थिक रूप से उसे बड़ी सफलता मिली है। गल्फ देशों ने ईरान की ताकत को पहचान लिया है। इजरायल और सऊदी अरब जैसे देश अब ईरान की शक्ति से डरे हुए हैं। अमेरिका के सामने 40 दिनों तक टिककर ईरान ने खुद को गल्फ देशों का प्रमुख साबित कर दिया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नई स्थिति
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो पहले निशुल्क था, अब ईरान के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत बन गया है। ईरान प्रति बैरल 1 डॉलर का टोल वसूलने की योजना बना रहा है। जहाजों से 2 मिलियन डॉलर तक वसूले जा रहे हैं। इस तरह से ईरान सालाना 70 से 80 अरब डॉलर का राजस्व कमा सकता है। अमेरिका के लिए बिना नाटो देशों के इस क्षेत्र में कुछ करना नामुमकिन है। ईरान ने इस कमजोरी को समझ लिया है और अपनी मांगों पर अडिग है।

तेल पर प्रतिबंधों में छूट
ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल भंडार है, जिसमें 208 अरब बैरल तेल शामिल है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वह निर्यात नहीं कर पा रहा था, लेकिन युद्ध के दौरान अमेरिका ने इन प्रतिबंधों को 30 दिनों के लिए हटा लिया। इसके बाद, भारत, चीन और अन्य एशियाई देश ईरान से तेल खरीदने लगे हैं, जिससे उसकी आय में वृद्धि हो रही है। ईरान अब अपनी तेल की ताकत को समझ चुका है और इसे जारी रखना चाहता है।