70 साल पुराना भूमि विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
एक 70 साल पुराना भूमि विवाद, जिसने आज़ाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा, अब सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय के साथ समाप्त हुआ है। यह मामला उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नारसीपुर कलां गांव की 15.5 बीघा ज़मीन से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता शराफत अली के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 1957 की सेल डीड को वैध माना। इस निर्णय ने यह साबित किया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में देर से ही सही, न्याय मिलता है। जानें इस ऐतिहासिक फैसले की पूरी कहानी।
Jun 27, 2026, 14:10 IST
भूमि विवाद का ऐतिहासिक फैसला
एक 70 साल पुराना भूमि विवाद, जिसने आज़ाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा, अब सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय के साथ समाप्त हुआ है। यह मामला उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नारसीपुर कलां गांव की 15.5 बीघा ज़मीन से संबंधित है। विवाद की शुरुआत 4 जून, 1957 को हुई, जब अपीलकर्ता शराफत अली के पूर्वजों ने एक सेल डीड के माध्यम से यह ज़मीन खरीदी थी। निचली अदालत और हाई कोर्ट ने इस सेल डीड को अमान्य करार दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध मानते हुए शराफत अली के पक्ष में फैसला सुनाया। इस निर्णय ने यह साबित किया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में देर से ही सही, न्याय मिलता है।
कानूनी यात्रा का विवरण
यह विवाद शराफत अली के पूर्वजों द्वारा की गई भूमि खरीद से शुरू हुआ, जब वे नाबालिक थे। इस मामले में शराफत अली का निधन हो चुका था, और उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी। जस्टिस मिश्रा ने बताया कि यह मामला म्यूटेशन प्रक्रिया से शुरू होकर यूपी जमींदारी अनुमूलन और भूमि सुधार अधिनियम 1950 तक पहुंचा। अपीलकर्ताओं को कई बार निचली अदालतों में निराशा का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेना पड़ा।
म्यूटेशन प्रक्रिया और विवाद
जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपीलकर्ताओं ने पाया कि उनके नाम का रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं था। चकबंदी अधिकारी ने उन्हें मालिक के रूप में दर्ज किया, लेकिन विक्रेता ने फिर से आपत्ति जताई। विक्रेता ने बाद में आपत्तियां वापस ले लीं, लेकिन सभी पक्षों के हस्ताक्षर नहीं होने के कारण विवाद जारी रहा। ट्रायल कोर्ट ने सेल डीड को शून्य घोषित कर दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्टर्ड सेल डीड की वैधता को चुनौती देने के लिए ठोस सबूत नहीं थे। इस आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया।