पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौतियाँ: ईरान युद्ध पर बैठक का नतीजा
पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों का स्वागत करने के दौरान संतुलन खो दिया और गिर पड़े। यह घटना केवल एक नेता के गिरने की नहीं, बल्कि पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति की गंभीरता को दर्शाती है। जब देश में आंतरिक समस्याएँ हैं, तब वह ईरान युद्ध में मध्यस्थ बनने का प्रयास कर रहा है।
बैठक का उद्देश्य
पाकिस्तान ने रविवार को सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ बैठक की, जिसका उद्देश्य अमेरिका-ईरान युद्ध को रोकना था। हालांकि, इस बैठक का परिणाम इशाक डार के गिरने की तरह ही निराशाजनक रहा। युद्ध की स्थिति और भी बिगड़ गई।
बैठक में शामिल नेता
इस्लामाबाद में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान, तुर्की के हाकन फिदान और मिस्र के बद्र अब्देलत्ती शामिल हुए। बैठक का मुख्य मुद्दा ईरान युद्ध को समाप्त करना और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना था, जो वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर रहा है।
मिस्र का प्रस्ताव
बैठक से पहले, इन देशों ने व्हाइट हाउस को कुछ प्रस्ताव भेजे थे, जिसमें मिस्र का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव था। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में शुल्क वसूलने की योजना शामिल थी। तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब एक कंसोर्टियम बनाने पर विचार कर रहे हैं, जो इस जलमार्ग से तेल की आवाजाही को नियंत्रित करेगा।
अमेरिका की प्रतिक्रिया
इस प्रस्ताव पर अमेरिका और ईरान के साथ चर्चा की गई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के संपर्क में हैं। हालांकि, इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है। तुर्की के एक कूटनीतिक सूत्र ने कहा कि युद्धविराम प्राथमिकता है।
बैठक का परिणाम
इशाक डार ने अपने समकक्षों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि ईरान ने 20 पाकिस्तानी जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी है, जबकि युद्ध की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
ईरान का रुख
बैठक में अमेरिका और इजरायल शामिल नहीं थे। मिस्र के विदेश मंत्री ने इसे अमेरिका और ईरान के बीच सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश बताया। ईरान ने एक 5-सूत्रीय प्रस्ताव तैयार किया है, जिसमें कई मांगें शामिल हैं।
वास्तविकता
जब इस्लामाबाद में कूटनीति की चर्चा हो रही थी, तब इजरायल पर हमले हो रहे थे। अमेरिका ने मध्य पूर्व में अतिरिक्त सैनिक भेजे हैं। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री ने बिना जमीनी सेना के लक्ष्य हासिल करने का दावा किया है।