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ईरान के इनकार के बावजूद अमेरिका की शांति वार्ता की बेचैनी

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में वार्ता के लिए पहुंच रहा है, जबकि ईरान ने बातचीत में शामिल होने से मना कर दिया है। ट्रंप की चिंता का मुख्य कारण ईरान की गुप्त युद्ध रणनीति है, जो चीन की मदद से चल रही है। यदि डॉलर के स्थान पर युआन में तेल का व्यापार किया गया, तो यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकता है। जानें इस वार्ता के पीछे की जटिलताएं और ट्रंप की बेचैनी का असली कारण।
 

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की इस्लामाबाद यात्रा

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में वार्ता के लिए पहुंच रहा है, जबकि ईरान ने बातचीत में शामिल होने से मना कर दिया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसके पास वार्ता के लिए कोई योजना नहीं है और इस संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया गया है। इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को एक कड़ी चेतावनी दी, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि ईरान के साथ दो हफ्ते का सीजफायर मंगलवार शाम को बिना किसी सफलता के समाप्त होता है, तो 'बहुत सारे बम फटने लगेंगे।'


ट्रंप की बेचैनी का कारण

एक ओर जहां वार्ता के लिए अमेरिका बेकरार है, वहीं दूसरी ओर वह लगातार धमकियां भी दे रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ईरान के इनकार के बावजूद ट्रंप वार्ता के लिए इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका मुख्य कारण ईरान की वह गुप्त युद्ध रणनीति है, जिसे वह चीन की सहायता से अंजाम दे रहा है।


अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप इस गुप्त युद्ध से चिंतित हैं। उनकी दिखावटी बहादुरी उस घबराहट को छिपाने की कोशिश है, जो अमेरिकी डॉलर और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराते खतरे से उत्पन्न हुई है। यदि इसे जल्द नहीं रोका गया, तो अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व समाप्त हो सकता है और उसकी अर्थव्यवस्था भी संकट में पड़ जाएगी।


पेट्रोडॉलर प्रणाली का महत्व

1970 के दशक से, अधिकांश तेल का व्यापार डॉलर में होता है, जिसे पेट्रोडॉलर प्रणाली कहा जाता है। यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत फायदेमंद है। दुनिया में डॉलर की मांग बनी रहती है, क्योंकि हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की आवश्यकता होती है। इससे डॉलर की कीमत स्थिर रहती है।


तेल बेचने वाले देश जो डॉलर कमाते हैं, वे उसे अमेरिकी बैंकों या सरकारी बॉंड में निवेश करते हैं, जिससे अमेरिका को कई लाभ होते हैं। इससे अमेरिका को सस्ता कर्ज मिलता है और डॉलर की उच्च कीमत के कारण उसे अन्य देशों से सामान आयात करना सस्ता पड़ता है।


युआन बनाम डॉलर की प्रतिस्पर्धा

यदि ईरान और चीन के अनुसार, डॉलर के स्थान पर युआन में तेल का व्यापार किया जाता है, तो पेट्रोडॉलर व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। इसका सबसे पहला प्रभाव अमेरिकी डॉलर की मांग पर पड़ेगा। यदि दुनिया को तेल के लिए डॉलर की आवश्यकता नहीं रहेगी, तो डॉलर की वैश्विक मांग कम हो जाएगी।


इससे डॉलर की कीमत में गिरावट आएगी और अमेरिका के लिए सामान आयात करना महंगा हो जाएगा। वहीं, जिन देशों की मुद्रा अमेरिका से मजबूत है, उनके लिए अमेरिकी सामान सस्ता हो जाएगा, जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी।


SWIFT प्रणाली पर संकट

अमेरिका को अपने 39 से 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज चुकाने के लिए निवेशकों को अधिक ब्याज देना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था संकट में पड़ जाएगी। सरल शब्दों में कहें तो अमेरिका का SWIFT सिस्टम एक तरह से पैसे के लेन-देन का माध्यम है।


SWIFT के माध्यम से दूसरे देशों को एक गुप्त कोड भेजा जाता है, जिसमें लेन-देन की पूरी जानकारी होती है। अमेरिका इसका उपयोग अपने दुश्मन देशों पर प्रतिबंध लगाने के लिए करता है, जिससे वे अन्य देशों के साथ लेन-देन नहीं कर पाते।


चीन का गुप्त खेल

ट्रंप की चिंता का एक बड़ा कारण चीन का जाल है। ट्रंप को यह महसूस हो रहा है कि वे ईरान से लड़ रहे हैं, लेकिन असली लाभ चीन उठा रहा है, जो चुपचाप डॉलर के प्रभुत्व को समाप्त कर रहा है।


अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट भी ट्रंप के डर को बढ़ा रही है, जिसमें ग्रेटर डिप्रेशन की आशंका व्यक्त की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि होर्मुज तीन महीने से अधिक समय तक इस स्थिति में रहा, तो कच्चे तेल की कीमतें 250 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इससे अमेरिका और यूरोप में महंगाई बढ़ेगी, जिसे ग्रेटर डिप्रेशन कहा जा सकता है।


यदि ऐसा होता है, तो यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगा और यही डर ट्रंप को बेचैन कर रहा है। ट्रंप इसी आर्थिक संकट को रोकने के लिए इस्लामाबाद वार्ता को लेकर इतने उतावले हैं।