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आरबीआई ने रुपए की गिरावट रोकने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपए की गिरावट को रोकने के लिए बैंकों को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस कदम का उद्देश्य सट्टेबाजी पर नियंत्रण और रुपए की ओपन पोजीशन को सीमित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रुपए में गिरावट जारी रहती है, तो आरबीआई और भी सख्त कदम उठा सकता है। जानें इस स्थिति के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

आरबीआई का नया कदम


नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपए की गिरावट को नियंत्रित करने और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए बैंकों को नए निर्देश दिए हैं। आरबीआई ने अधिकृत डीलरों से कहा है कि वे दिन के अंत तक रुपए में अपनी ओपन पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित रखें।

रुपए पर बढ़ते दबाव के बीच उठाया गया कदम
यह निर्णय उस समय लिया गया है जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण व्यापार घाटा बढ़ गया है, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ा है।

केंद्रीय बैंक ने सभी वाणिज्यिक बैंकों को यह दैनिक सीमा 10 अप्रैल तक लागू करने के लिए कहा है। इसके अलावा, बाजार की स्थिति के अनुसार इस सीमा को बदला भी जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रुपए में गिरावट जारी रहती है, तो आरबीआई और भी कठोर कदम उठा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि रुपए को सहारा देने के लिए आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार का काफी उपयोग किया है, जिससे उसकी हस्तक्षेप करने की क्षमता सीमित हो गई है।

रुपया 94 के स्तर को पार कर गया
शुक्रवार को रुपए ने पहली बार 94 प्रति डॉलर के नीचे जाने का रिकॉर्ड बनाया और लगभग 1 प्रतिशत गिर गया। अमेरिकी-ईरान संघर्ष के बाद से इसमें कुल मिलाकर 4 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है।

इस बीच, ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जो आरबीआई के अक्टूबर में निर्धारित 70 डॉलर के अनुमान से काफी अधिक है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ा है और महंगाई तथा मुद्रा संतुलन बनाए रखना आरबीआई के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है और बाजार का मूल्यांकन (पी/ई अनुपात) कम होता है, तो भारतीय बाजार में तेजी लौट सकती है।

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में रुपया सुधरकर लगभग 91 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है। साथ ही, 10 साल के सरकारी बॉंड की यील्ड भी मौजूदा 6.83 प्रतिशत से घटकर लगभग 6.65 प्रतिशत तक आ सकती है। सामान्य स्थिति में लौटने में 2-3 महीने लग सकते हैं।

एक अन्य रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था अभी स्थिर है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें आगे भी देश के बाहरी संतुलन को प्रभावित करेंगी।

यदि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो इससे भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी) बढ़ सकता है, जिसका असर आर्थिक विकास और महंगाई पर भी पड़ेगा।