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रुपये की गिरावट: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नया रिकॉर्ड

भारतीय रुपये की अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरावट ने आर्थिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। ईरान संघर्ष और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रुपये ने नया रिकॉर्ड बनाया है। जानिए इसके पीछे के कारण और भविष्य में क्या हो सकता है।
 

रुपये की गिरावट का कारण

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। मंगलवार को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह दिन चिंताजनक साबित हुआ, जब रुपया 35 पैसे गिरकर 95.63 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हो रही वृद्धि ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है।


रुपये में गिरावट के प्रमुख कारण

रुपये में गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और युद्धविराम की उम्मीदों का कमजोर होना है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, भारत की आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया। पिछले सप्ताह रुपये का स्तर 95.43 था, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतों ने निवेशकों के मनोबल को प्रभावित किया और रुपये को नए रिकॉर्ड स्तर पर धकेल दिया।


डोनाल्ड ट्रंप के बयान का प्रभाव

रुपये पर दबाव फरवरी के अंत में शुरू हुए ईरान संघर्ष के बाद से बना हुआ है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक ने बीच-बीच में हस्तक्षेप कर रुपये को संभालने की कोशिश की है। 8 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर पर सहमति बनी थी, लेकिन हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने बाजार में फिर से डर का माहौल बना दिया। ट्रंप ने कहा कि सीजफायर अब 'लाइफ सपोर्ट' पर है, जिसका मतलब है कि यह कभी भी टूट सकता है।


भारत की आर्थिक स्थिरता पर खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रेंट क्रूड की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो यह भारत की बाहरी स्थिरता के लिए खतरे की घंटी होगी। महंगे तेल के कारण भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग में वृद्धि होती है। इसका सीधा असर रुपये की स्थिति पर पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में ईंधन बचाने और विदेशी खर्च में कटौती करने की अपील की है, जिसे इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि सरकार पहले से ही वित्तीय घाटे को लेकर सतर्क है, और रुपये की गिरावट से उनकी चिंता और बढ़ सकती है।


रुपये की गिरावट का भविष्य