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भारत में बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा

भारत के बैंकों में क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो (CDR) अब 83 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जो एक रिकॉर्ड स्तर है। इस वृद्धि का अर्थ है कि बैंकों ने अपनी जमा राशि का बड़ा हिस्सा लोन के रूप में वितरित कर दिया है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, जमा राशि में कमी आई है, जबकि लोन में वृद्धि हुई है। जानें कि यह स्थिति बैंकिंग क्षेत्र और ग्राहकों पर कैसे प्रभाव डाल सकती है, और क्या एफडी और ब्याज दरों में बदलाव संभव है।
 

बैंकों में जमा राशि और लोन की स्थिति


भारत के बैंकों में क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो (CDR) अब तक के उच्चतम स्तर 83 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसका मतलब है कि बैंकों ने अपनी जमा राशि का 83 प्रतिशत लोन के रूप में वितरित कर दिया है। हाल के 15 दिनों में जमा राशि में 1.8 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है, जिससे यह 250 लाख करोड़ रुपये रह गई है। वहीं, बैंक क्रेडिट में 18,672 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है, जो अब 207.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

सीडीआर का महत्व
सीडीआर बैंकिंग क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो दर्शाता है कि बैंक ने अपनी जमा राशि का कितना प्रतिशत लोन के रूप में दिया है। इसे इस तरह समझा जा सकता है: यदि बैंक में 1000 रुपये जमा हैं और 800 रुपये लोन दिए गए हैं, तो सीडीआर 80 प्रतिशत होगा। इसका बढ़ना यह दर्शाता है कि लोग अपना पैसा बैंक में रखने के बजाय बाजार में अधिक रख रहे हैं।

वित्तीय वर्ष 2026 का विश्लेषण
31 मार्च के करीब, वित्तीय वर्ष 2026 के दौरान नए लोन 25.3 लाख करोड़ रुपये रहे, जबकि जमा राशि केवल 24.3 लाख करोड़ रुपये बढ़ी। यह दर्शाता है कि लोन की मांग जमा के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है। साल दर साल की वृद्धि दर में बैंक क्रेडिट 13.8 प्रतिशत और डिपॉजिट 10.8 प्रतिशत रही।

सीडीआर का सुरक्षित स्तर
किसी भी बैंक को अपनी जमा राशि का लगभग 3 प्रतिशत कैश रिजर्व रेशियो (CRR) के रूप में आरबीआई के पास रखना आवश्यक है, साथ ही 18 प्रतिशत स्टेट्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) के तहत सरकारी बॉंड में निवेश करना होता है। इसलिए, 80 प्रतिशत का सीडीआर सामान्य और सुरक्षित माना जाता है। 83 प्रतिशत का स्तर यह संकेत देता है कि बैंकों की लिक्विडिटी कम हो रही है।

सीडीआर का ऐतिहासिक संदर्भ
पिछले वित्तीय वर्ष में, कोविड के बाद की रिकवरी के दौरान सीडीआर लगातार 100 प्रतिशत से ऊपर रहा। उस समय लोन की वृद्धि दर 16-17 प्रतिशत थी, जबकि डिपॉजिट केवल 9-10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे थे। हालिया आंकड़ों में भी इसी तरह का ट्रेंड देखा जा रहा है।

एफडी और ब्याज दरों में संभावित वृद्धि
बैंकों में क्रेडिट रेश्यो बढ़ने से लिक्विडिटी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। डिपॉजिट को आकर्षित करने के लिए बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं। इससे एफडी की ब्याज दरें भी बढ़ सकती हैं, जिससे लोन की ब्याज दरों में भी वृद्धि हो सकती है। हालांकि, वर्तमान में सिस्टम में कोई बड़ी चिंता नहीं है। यदि यह अंतर लंबे समय तक बना रहा, तो बैंकों को लिक्विडिटी प्रबंधन पर अधिक ध्यान देना होगा।